श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 35

 
श्लोक
सङ्कर्षणाय सूक्ष्माय दुरन्तायान्तकाय च ।
नमो विश्वप्रबोधाय प्रद्युम्नायान्तरात्मने ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
सङ्कर्षणाय—निर्माण (समन्वय) के स्वामी को; सूक्ष्माय—सूक्ष्म रूप या अव्यक्त को; दुरन्ताय—दुर्लंघ्य को; अन्तकाय—संहार के स्वामी को; च—भी; नम:—नमस्कार; विश्व-प्रबोधाय—ब्रह्माण्ड का विकास करने वाले को; प्रद्युम्नाय—प्रद्युम्न को; अन्त:-आत्मने—घट-घट वासी परमात्मा को ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, आप सूक्ष्म भौतिक तत्त्वों के उद्गम, समस्त संघटन और संहार के स्वामी, संकर्षण नामक अधिष्ठाता तथा समस्त बुद्धि के अधिष्ठाता प्रद्युम्न हैं। अत: मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड संकर्षण नाम से जाने वाले परमेश्वर की संघटनकारी शक्ति से चल रहा है। भौतिक विज्ञानी भले ही गुरुत्वाकर्षण के नियम की खोज कर चुके हों जिससे भौतिक शक्ति से पदार्थों का संघटन होता है, किन्तु समस्त संघटनों का स्वामी अपने मुख से निकलने वाली प्रज्ज्वलित अग्नि से प्रलय (संहार) भी कर सकता है। इसका वर्णन भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में मिलता है, जिसमें भगवान् के विराट रूप का वर्णन है। अपनी संहारक शक्ति के कारण संघटन का स्वामी इस संसार का संहारकर्ता भी है। संकर्षण संघटन तथा संहार के अधिष्ठाता हैं, जबकि भगवान् वासुदेव के एक अन्य रूप प्रद्युम्न इस विश्व की वृद्धि
तथा उसकी स्थिति के लिए उत्तरदायी हैं। सूक्ष्माय शब्द भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इस स्थूल शरीर के भीतर सूक्ष्म शरीर यथा मन, बुद्धि तथा अहंकार वास करते हैं। भगवान् अपने विविध रूपों (वासुदेव, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न तथा संकर्षण) में इस संसार में स्थूल तथा सूक्ष्म तत्त्वों को बनाये रखते हैं। जैसाकि भगवद्गीता में उल्लेख हुआ है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश स्थूल तत्त्व हैं, जबकि मन, बुद्धि तथा अहंकार सूक्ष्म तत्त्व हैं। ये सभी भगवान् द्वारा वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध के रूप में नियंत्रित होते हैं और इसका और आगे वर्णन निम्नलिखित श्लोक में किया जाएगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥