श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 36

 
श्लोक
नमो नमोऽनिरुद्धाय हृषीकेशेन्द्रियात्मने ।
नम: परमहंसाय पूर्णाय निभृतात्मने ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
नम:—आपको नमस्कार है; नम:—नमस्कार है; अनिरुद्धाय—अनिरुद्ध को; हृषीकेश—इन्द्रियों के स्वामी; इन्द्रिय-आत्मने— इन्द्रियों के नियामक को; नम:—नमस्कार है; परम-हंसाय—परमहंस को; पूर्णाय—परम पूर्ण को; निभृत-आत्मने—उसे जो इस जगत से अलग स्थित है ।.
 
अनुवाद
 
 हे परम अधिष्ठाता अनिरुद्ध रूप भगवान्, आप इन्द्रियों तथा मन के स्वामी हैं। अत: मैं आपको बारम्बार नमस्कार करता हूँ। आप अनन्त तथा साथ ही साथ संकर्षण कहलाते हैं, क्योंकि अपने मुख से निकलने वाली धधकती हुई अग्नि से आप सारी सृष्टि का संहार करने में समर्थ हैं।
 
तात्पर्य
 हृषीकेशेन्द्रियात्मने—मन इन्द्रियों का स्वामी है और अनिरुद्ध मन के अधिष्ठाता हैं। भक्ति करने के लिए मन को कृष्ण के चरणकमलों में स्थिर करना होता है, अत: शिवजी मन के अधिष्ठाता अनिरुद्ध से प्रार्थना करते हैं कि वे प्रसन्न हों जिससे उनका मन भगवान् के चरणकमलों में लगे। भगवद्गीता (९.३४) में कहा गया है—मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। भक्ति करने के लिए मन को भगवान् के चरणकमलों के ध्यान में लगाना होता है। भगवद्गीता (१५.१५) में यह भी कहा गया है—मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च—भगवान् से ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति आते हैं। अत: यदि भगवान् अनिरुद्ध प्रसन्न हो जाँय तो भगवान् की भक्ति में मन लगाने में सहायता मिलती है। इस श्लोक में यह भी इंगित है कि अनिरुद्ध अपने विस्तार स्वरूप से सूर्यदेव भी हैं। चूँकि सूर्यदेव भगवान् अनिरुद्ध के ही विस्तार हैं, अत: इस श्लोक में शिवजी सूर्यदेव की भी स्तुति करते हैं।
भगवान् कृष्ण अपने चतुर्मुखी विस्तार (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध) के कारण मानसिक क्रियाओं—सोचना, अनुभव करना, इच्छा करना तथा कर्म करना—के भी स्वामी हैं। शिवजी अनिरुद्ध की सूर्यदेव के रूप में स्तुति करते हैं, जो बाह्य भौतिक तत्त्वों के अधिष्ठाता हैं जिनसे यह शरीर बनता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार परमहंस शब्द सूर्यदेवता का अन्य नाम है। यहाँ पर सूर्यदेव को निभृतात्मने कह कर सम्बोधित किया गया है, जो इस बात का सूचक है कि वर्षा के द्वारा वह विभिन्न लोकों का पालन करते हैं। सूर्यदेव समुद्रों के जल को भाप में बदल कर बादल बनाते हैं और फिर जल को सारी भूमि पर वितरित करते हैं। पर्याप्त वर्षा होने से अन्न उत्पन्न होता है, जिससे प्रत्येक लोक के जीवों का भरण होता है। सूर्यदेव को भी यहाँ पूर्ण कहा गया है, क्योंकि सूर्य से निस्सृत किरणों का कोई अन्त नहीं है। सृष्टि के प्रारम्भ से ही करोड़ों वर्षों से सूर्यदेव बिना किसी कमी के ताप तथा प्रकाश प्रदान करते रहे हैं। परमहंस शब्द उन व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है, जो पूर्ण रूप से विमल हैं। जब प्रचुर सूर्य प्रकाश (धूप) होता है, तो मन स्वच्छ तथा पारदर्शी रहता है। दूसरे शब्दों में, सूर्यदेव जीवात्मा के मन को परमहंस-पद पर स्थित होने में सहायक होते हैं। शिवजी अनिरुद्ध से अपने ऊपर दयालु होने की प्रार्थना करते हैं, जिससे उनका मन सदैव विमल रहे और भगवान् की भक्ति में लगा रहे। जिस प्रकार अग्नि समस्त मलिन वस्तुओं को शुद्ध करती है, उसी प्रकार सूर्य भी प्रत्येक वस्तु को शुद्ध बनाता है, विशेष रूप से मन के मैल को शुद्ध करता है, जिससे मनुष्य आत्मज्ञान प्राप्त करने के स्तर पर उठ सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥