श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 37

 
श्लोक
स्वर्गापवर्गद्वाराय नित्यं शुचिषदे नम: ।
नमो हिरण्यवीर्याय चातुर्होत्राय तन्तवे ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
स्वर्ग—स्वर्गलोक; अपवर्ग—मोक्ष का मार्ग; द्वाराय—द्वार को; नित्यम्—शाश्वत; शुचि-षदे—परम पवित्र को; नम:—नमस्कार है; नम:—नमस्कार है; हिरण्य—स्वर्ण; वीर्याय—वीर्य को; चातु:-होत्राय—चातुर्होत्र नामक वैदिक यज्ञ को; तन्तवे—विस्तार करने वाले को ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान् अनिरुद्ध, आपके आदेश से स्वर्ग तथा मोक्ष के द्वार खुलते हैं। आप निरन्तर जीवों के शुद्ध हृदय में निवास करते हैं, अत: मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप स्वर्ण सदृश वीर्य के स्वामी हैं और इस प्रकार आप अग्नि रूप में चातुर्होत्र इत्यादि वैदिक यज्ञों में सहायता करते हैं। अत: मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 स्वर्ग शब्द स्वर्गलोक का सूचक है और अपवर्ग का अर्थ है मोक्ष। जो लोग वेदों में वर्णित कर्मकाण्डीय कर्मों में लगे रहते हैं, वे वास्तव में प्रकृति के तीन गुणों से बँध जाते हैं। अत: भगवद्गीता का कथन है कि मनुष्य को सकाम कर्मों के प्रक्षेत्र से ऊपर उठकर रहना चाहिए। मुक्ति कई प्रकार की होती है। सर्वश्रेष्ठ मुक्ति तो परमेश्वर की
भक्ति में प्रवृत्त होना है। भगवान् अनिरुद्ध न केवल सकाम कर्मियों को उच्चतर लोकों में पहुँचने में सहायक होते हैं, अपितु अपनी अक्षय शक्ति से भक्त को भक्ति में प्रवृत्त कराते हैं। जिस प्रकार ताप भौतिक शक्ति का स्रोत है उसी प्रकार भगवान् अनिरुद्ध का प्रोत्साहन वह शक्ति है, जिससे मनुष्य भक्ति करने में प्रवृत्त हो सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥