श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 38

 
श्लोक
नम ऊर्ज इषे त्रय्या: पतये यज्ञरेतसे ।
तृप्तिदाय च जीवानां नम: सर्वरसात्मने ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
नम:—नमस्कार है; ऊर्जे—पितृलोक के पोषक को; इषे—समस्त देवताओं का भरण करने वाला; त्रय्या:—तीनों वेदों के; पतये—स्वामी को; यज्ञ—यज्ञ; रेतसे—चन्द्रलोक के प्रमुख श्रीविग्रह को; तृप्ति-दाय—उनको जो सबों को तृप्त करते हैं; च— भी; जीवानाम्—जीवात्माओं का; नम:—नमस्कार है; सर्व-रस-आत्मने—सर्वव्यापी परमात्मा को ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, आप पितृलोक तथा सभी देवताओं के भी पोषक हैं। आप चन्द्रमा के प्रमुख श्रीविग्रह और तीनों वेदों के स्वामी हैं। मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ, क्योंकि आप समस्त जीवात्माओं की तृप्ति के मूल स्रोत हैं।
 
तात्पर्य
 जब जीव इस जगत में जन्म लेता है, विशेषत: मनुष्य के रूप में, तो देवताओं, साधु पुरुषों तथा सामान्य जीवों के प्रति उसके कई ऋण होते हैं। शास्त्रों का वचन है—देवर्षिभूताप्तनृणां पितृणाम्। इस प्रकार उसका अपने पूर्वजों के प्रति भी ऋण होता है। शिवजी भगवान् अनिरुद्ध से प्रार्थना करते हैं कि मुझे शक्ति दीजिये, जिससे मैं पितरों, देवों, सामान्य जीवों तथा साधुओं के प्रति अपने ऋणों से उऋण हो सकूँ और अपने आपको पूर्ण रूप से भगवान् की भक्ति में लगा सकूँ। जैसाकि भागवत (११.५.४१) में कहा गया है—
देवर्षिभूताप्तनृणां पितृणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्।

सर्वात्मना य: शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम् ॥

मनुष्य भक्ति में पूर्ण रूप से प्रवृत्त होने से देवताओं, साधु पुरुषों, पितरों, पूर्वजों आदि के ऋण से मुक्त हो जाता है। इसीलिए शिवजी भगवान् अनिरुद्ध से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें शक्ति प्रदान करें जिससे वे सभी ऋणों से मुक्त होकर भगवद्भक्ति में पूर्णरूपेण तत्पर हो सकें।

जीव को जीभ से भोजन का जो स्वाद मिलता है उसके लिए सोम अर्थात् चन्द्रमा का श्रीविग्रह उत्तरदायी है। शिवजी भगवान् अनिरुद्ध से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें ऐसी शक्ति दें जिससे वे जीभ से भगवान् के प्रसाद के अतिरिक्त अन्य किसी का स्वाद न लें। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर ने एक श्लोक में लिखा है कि समस्त इन्द्रियों में जीभ ही सबसे दुर्जेय शत्रु है। जीभ पर नियंत्रण पाने से अन्य सभी इन्द्रियाँ वश में की जी सकती हैं और जीभ केवल श्रीविग्रह को अर्पित प्रसाद ग्रहण करने से वश में की जा सकती है। शिवजी द्वारा अनिरुद्ध से जो प्रार्थना की गई वह इसी प्रयोजन के लिए है (तृप्ति दाय ); वे उनसे यही प्रार्थना करते हैं कि वे उनकी सहायता करें जिससे वे भगवान् को अर्पित प्रसाद को ग्रहण करके प्रसन्न रह सकें।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥