श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 39

 
श्लोक
सर्वसत्त्वात्मदेहाय विशेषाय स्थवीयसे ।
नमस्त्रैलोक्यपालाय सह ओजोबलाय च ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
सर्व—समस्त; सत्त्व—अस्तित्व; आत्म—जीव; देहाय—शरीर को; विशेषाय—विभिन्नता को; स्थवीयसे—भौतिक संसार को; नम:—नमस्कार; त्रै-लोक्य—तीनों लोकों के; पालाय—पालक; सह—के साथ; ओज:—ओज; बलाय—बल (शक्ति) को; च—भी ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, आप विराटस्वरूप हैं जिसमें समस्त जीवात्माओं के शरीर समाहित हैं। आप तीनों लोकों के पालक हैं, फलत: आप मन, इन्द्रियों, शरीर तथा प्राण का पालन करने वाले हैं। अत: मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 जिस प्रकार जीवात्मा का शरीर असंख्य कोषों, कीटाणुओं तथा जीवाणुओं से बना है उसी प्रकार भगवान् का विराट शरीर में समस्त जीवों के शरीर समाहित हैं। शिवजी उस विराट शरीर की प्रार्थना कर रहे हैं जिसमें अन्य समस्त शरीर सम्मिलित हैं, जिससे प्रत्येक व्यक्ति सशरीर भक्ति कर सके। चूँकि यह शरीर इन्द्रियों से बना है, अत: समस्त इन्द्रियों को भक्ति में लगाना चाहिए। उदाहरणार्थ, नाक को चाहिए कि भगवान् के चरणकमलों पर अर्पित फूलों की सुगन्धि ले, हाथों को चाहिए कि भगवान् के मन्दिर को बुहारे, इत्यादि। निस्सन्देह, प्रत्येक जीवात्मा का प्राण होने के कारण भगवान् तीनों लोकों के पालक हैं, अत: वे प्रत्येक जीवात्मा को पूर्ण शारीरिक तथा मानसिक शक्ति के साथ-साथ जीवन को वास्तविक कर्म में प्रवृत्त करा सकते हैं। इस प्रकार प्रत्येक जीवात्मा को अपने प्राण (जीवन), अर्थ (धन), बुद्धि तथा वाणी से भगवान् की सेवा करनी चाहिए। श्रीमद्भागवत (१०.२२.३५) में आया है—
एतावज्जन्म साफल्यं देहिनामिह देहिषु।

प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेयआचरणं सदा ॥

यदि कोई भगवद्भक्ति करना भी चाहे तो भगवान् की आज्ञा के बिना वह ऐसा नहीं कर सकता। शिवजी जीवात्माओं को यह दिखाने के लिए कि भक्ति कैसे की जाती है, इतनी प्रकार से प्रार्थना कर रहे हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥