श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 4

 
श्लोक
पावक: पवमानश्च शुचिरित्यग्नय: पुरा ।
वसिष्ठशापादुत्पन्ना: पुनर्योगगतिं गता: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
पावक:—पावक नामक; पवमान:—पवमान नामक; च—भी; शुचि:—शुचि नामक; इति—इस प्रकार; अग्नय:—अग्निदेव; पुरा—प्राचीन काल में; वसिष्ठ—वसिष्ठ मुनि; शापात्—शाप से; उत्पन्ना:—अब उत्पन्न; पुन:—फिर से; योग-गतिम्— योगाभ्यास का पद; गता:—प्राप्त किया ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज अन्तर्धान के तीनों पुत्रों के नाम थे पावक, पवमान तथा शुचि। पूर्वकाल में ये तीनों व्यक्ति अग्निदेव थे, परन्तु वसिष्ठ ऋषि के शाप से वे महाराज अन्तर्धान के पुत्रों के रूप में उत्पन्न हुए; फलत: वे अग्निदेवों के ही समान शक्तिमान थे और फिर से अग्निदेवों के रूप में स्थित होने के कारण उन्होंने योगशक्ति का पद प्राप्त किया।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (६.४१-४३) में कहा गया है कि जो योगाभ्यास से नीचे गिरता है, वह स्वर्गलोक को जाता है और वहाँ सुख भोगकर पुन: पृथ्वी पर आता है तथा किसी धनी कुल में या पवित्र ब्राह्मण-कुल में जन्म लेता है। अत: यह समझना चाहिए कि जब देवता भ्रष्ट होते हैं, तो वे पृथ्वी पर अत्यन्त धनी तथा
पवित्र कुलों में जन्म लेते हैं। ऐसे परिवारों में कृष्णभक्ति करने का अवसर प्राप्त होता है, जिससे उन्हें वाञ्छित गन्तव्य प्राप्त होता है। महाराज अन्तर्धान के पुत्र अग्नि के अधीक्षक देवता थे, उन्होंने अपनी पूर्वस्थिति प्राप्त की थी और योगबल से वे स्वर्ग को चले गये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥