श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 40

 
श्लोक
अर्थलिङ्गाय नभसे नमोऽन्तर्बहिरात्मने ।
नम: पुण्याय लोकाय अमुष्मै भूरिवर्चसे ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
अर्थ—तात्पर्य; लिङ्गाय—प्रकट करने हेतु; नभसे—आकाश को; नम:—नमस्कार; अन्त:—भीतर; बहि:—तथा बाहर; आत्मने—अपने आपको; नम:—नमस्कार; पुण्याय—पुण्य कर्मों को; लोकाय—सृष्टि के लिए; अमुष्मै—मृत्यु के परे; भूरि वर्चसे—परम तेज ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, आप अपनी दिव्य वाणी (शब्दों) को प्रसारित करके प्रत्येक वस्तु का वास्तविक अर्थ प्रकट करने वाले हैं। आप भीतर-बाहर सर्वव्याप्त आकाश हैं और इस लोक में तथा इससे परे किये जाने वाले समस्त पुण्यकर्मों के परम लक्ष्य हैं। अत: मैं आपको पुन: पुन: सादर नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 वैदिक प्रमाण शब्द-ब्रह्म कहलाता है। ऐसी अनेक वस्तुएँ हैं, जो हमारी अपूर्ण इन्द्रियों के निरीक्षण से परे हैं, किन्तु शब्द का प्रामाणिक साक्ष्य पूर्ण है। वेद शब्द-ब्रह्म कहलाते हैं, क्योंकि वेदों का प्रमाण (साक्ष्य) ही परम ज्ञान है। इसका कारण यह है कि शब्द-ब्रह्म या वेद भगवान् का प्रतिनिधित्व करते हैं। किन्तु शब्द-ब्रह्म का वास्तविक सार तो हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन है। इस दिव्य ध्वनि के उच्चारण से भौतिक तथा आध्यात्मिक सारी वस्तुओं का अर्थ प्रकट हो जाता हैं। यह हरे कृष्ण महामंत्र भगवान् से अभिन्न है। प्रत्येक वस्तु का अर्थ वायु के माध्यम से प्राप्त शब्द ध्वनि से प्रकट होता है। यह ध्वनि चाहे भौतिक हो या आध्यात्मिक, किन्तु बिना शब्द-ध्वनि के किसी बात का कोई अर्थ समझा नहीं जा सकता। वेदों में कहा गया है—अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याय नारायण:स्थित:—
“नारायण सर्वव्यापी हैं और वे भीतर तथा बाहर स्थित रहते हैं।” इसकी पुष्टि भगवद्गीता (१३.३४) में इस प्रकार हुई है—

यथा प्रकाशयत्येक: कृत्स्नं लोकमिमं रवि:।

क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥

“हे भरतवंशी! जिस प्रकार इस ब्रह्माण्ड को अकेला सूर्य प्रकाशित करता है, उसी प्रकार जीवात्मा तथा परमात्मा चेतना द्वारा सम्पूर्ण शरीर को प्रकाशित करते हैं।”

दूसरे शब्दों में, आत्मा तथा परमात्मा की चेतना सर्वव्यापी है, आत्मा अपनी सीमित चेतना से सम्पूर्ण भौतिक शरीर में व्याप्त रहती है और भगवान् की परम चेतना सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त रहती है। चूँकि आत्मा शरीर के भीतर स्थित है, अत: चेतना सारे शरीर में व्याप्त रहती है। इसी प्रकार परमात्मा या श्रीकृष्ण इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं, अत: हर वस्तु व्यवस्थित रूप से कार्य करती है। मयाध्यक्षेण प्रकृति:सूयते सचराचरम्—“हे कुन्ती पुत्र! यह प्रकृति मेरे निर्देशन में कार्य कर रही है और समस्त चर तथा अचर प्राणियों को उत्पन्न करती है।” (भगवद्गीता ९.१०)।

अत: शिवजी भगवान् से प्रार्थना करते हैं कि वे कृपालु हों, जिससे केवल हरे कृष्ण मंत्र के जप से ही भौतिक एवं आध्यात्मिक लोकों में प्रत्येक वस्तु को समझा जा सके। इस प्रसंग में अमुष्मै शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उच्चलोक प्राप्त करने के बाद सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य इंगित होता है। जो कर्मी हैं, वे अपने पूर्वकर्मों के फल के अनुसार स्वर्ग प्राप्त करते हैं और ज्ञानियों को भी जो ब्रह्म-ज्योति में लीन होना चाहते है, वाञ्छित फल मिलता है, किन्तु अन्तत: भक्त ही, जो साक्षात् भगवान् की संगति चाहते हैं, वैकुण्ठलोक या गोलोक वृन्दावन को जाते हैं। श्रीमद्भागवत (१०.१२) में भगवान् को पवित्रं परमम् कहा गया है। इसकी पुष्टि इस श्लोक से होती है। शुकदेव गोस्वामी ने कहा है कि श्रीकृष्ण के साथ खेलने वाले ग्वालबाल सामान्य जीव नहीं थे। विभिन्न जन्मों में अनेक पुण्यकर्मों को संचित करते रहने से ही भगवान् का साहचर्य प्राप्त होता है। चूँकि पवित्रात्मा ही उन्हें प्राप्त कर सकते हैं, अत: भगवान् परम शुद्ध हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥