श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 41

 
श्लोक
प्रवृत्ताय निवृत्ताय पितृदेवाय कर्मणे ।
नमोऽधर्मविपाकाय मृत्यवे दु:खदाय च ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
प्रवृत्ताय—प्रवृत्ति; निवृत्ताय—निवृत्ताय; पितृ-देवाय—पितृलोक के स्वामी को; कर्मणे—सकाम कर्मों के फल को; नम:— नमस्कार; अधर्म—अधर्म; विपाकाय—फल को; मृत्यवे—मृत्यु को; दु:ख-दाय—समस्त प्रकार के दुखों का कारण; च— भी ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, आप पुण्यकर्मों के फलों के दृष्टा हैं। आप प्रवृत्ति, निवृत्ति तथा उनके कर्म-रूपी परिणाम (फल) हैं। आप अधर्म से जनित जीवन के दुखों के कारणस्वरूप हैं, अत: आप मृत्यु हैं। मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 भगवान् प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्थित हैं और उन्हीं से जीवात्मा में प्रवृत्ति तथा निवृत्ति उत्पन्न होती हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (१५.१५) में हुई है—
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

“मैं प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्थित हूँ और मुझी से स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति उत्पन्न होती हैं।” भगवान् कुछ ऐसा करते हैं जिससे असुर लोग तो उन्हें भूल जाते हैं, किन्तु भक्त उनका स्मरण करते रहते हैं। मनुष्य में निवृत्ति भी भगवान् के ही कारण है। भगवद्गीता के अनुसार (१६.७)— प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा:—असुरों को यह पता नहीं रहता कि किधर प्रवृत्त हुआ जाये और किधर नहीं। यद्यपि असुर भक्ति के विरोधी हैं, किन्तु यह समझ लेना चाहिए कि वे भगवान् की इच्छा से ऐसा करते हैं। चूँकि असुर भगवान् की भक्ति नहीं करना चाहते, अत: भगवान् उनके ह्रदय के भीतर से उन्हें ऐसी बुद्धि देते हैं कि वे उन्हें भूल जाँय। सामान्य कर्मी पितृलोक जाना चाहते हैं जैसाकि भगवद्गीता (९.२५) में कहा गया है—यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रता:—“जो देवताओं की पूजा करते हैं, वे देवताओं में जन्म लेंगे और जो पितरों को पूजते हैं, वे पितरों के पास जाएँगे।” इस श्लोक का दु:खदाय शब्द भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि जो अभक्त हैं, वे जन्ममरण के चक्र में निरन्तर घूमते रहते हैं। यह अत्यन्त दुखदायी अवस्था है। चूँकि कर्मों के अनुसार मनुष्य को पद प्राप्त होता है, अत: असुर या अभक्त ऐसी दुखदायी स्थितियों में पड़े रहते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥