श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 42

 
श्लोक
नमस्त आशिषामीश मनवे कारणात्मने ।
नमो धर्माय बृहते कृष्णायाकुण्ठमेधसे ।
पुरुषाय पुराणाय साङ्ख्ययोगेश्वराय च ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
नम:—नमस्कार; ते—तुमको; आशिषाम् ईश—हे समस्त आशीर्वादों को प्रदान करने वालों में श्रेष्ठ; मनवे—परम मन या परम मनु को; कारण-आत्मने—समस्त कारणों के कारण; नम:—नमस्कार; धर्माय—समस्त धर्मों के ज्ञाता को; बृहते—सर्वश्रेष्ठ; कृष्णाय—कृष्ण को; अकुण्ठ-मेधसे—जिनकी चेतना कभी कुण्ठित नहीं होती उन्हें; पुरुषाय—परम पुरुष को; पुराणाय— सबसे प्राचीन; साङ्ख्य-योग-ईश्वराय—सांख्य योग के नियमों के अधीश्वर को; च—तथा ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, आप आशीर्वादों के समस्त प्रदायकों में सर्वश्रेष्ठ, सबसे प्राचीन तथा समस्त भोक्ताओं में परम भोक्ता हैं। आप समस्त सांख्य योग-दर्शन के अधिष्ठाता हैं। आप समस्त कारणों के कारण भगवान् कृष्ण हैं। आप सभी धर्मों में श्रेष्ठ हैं, आप परम मन हैं और आपका मस्तिष्क (बुद्धि) ऐसा है, जो कभी कुण्ठित नहीं होता। अत: मैं आपको बारम्बार नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में कृष्णाय अकुण्ठ-मेधसे शब्द महत्त्वपूर्ण हैं। आधुनिक विज्ञानियों ने अनिश्चितता सिद्धान्त की खोज कर लेने के बाद एक तरह से सोचना बन्द कर दिया है, किन्तु वास्तव में मनुष्य के लिए कोई भी मानसिक कार्य ऐसा नहीं है, जिसे काल तथा आकाश की सीमाओं में बाँधा न जा सके। जीवात्मा अणु है, अर्थात् परमात्मा का एक अणु है, फलत: उसका मस्तिष्क (मन) भी अणुवत् है। उसमें अनन्त ज्ञान नहीं समा सकता, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि श्रीकृष्ण का भी मस्तिष्क सीमित है। जो कुछ कृष्ण कहते या करते हैं वह समय तथा आकाश (दिक्) से बँधा नहीं है। भगवद्गीता (७.२६) में भगवान् कहते हैं—
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।

भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥

“हे अर्जुन! भूतकाल में जो हुआ है, वर्तमान में जो कुछ हो रहा है तथा आगे जो कुछ होना है, मैं वह सब भगवान् के रूप में जानता हूँ। मैं सभी जीवों को भी जानता हूँ, किन्तु मुझे कोई नहीं जानता।”

कृष्ण तो सब कुछ जानते हैं, किन्तु जब तक उनकी कृपा न हो कोई उन्हें जान नहीं सकता। अत: कृष्ण तथा उनके प्रतिनिधि के लिए अनिश्चितता सिद्धान्त का प्रश्न ही नहीं उठता। कृष्ण जो भी कहते हैं, वह अपने में पूर्ण और निश्चित है और वह भूत, वर्तमान तथा भविष्य पर लागू होता है। और जो कुछ कृष्ण कहते हैं उसे जानने वाले के लिए कोई अनिश्चितता नहीं है। कृष्णभावनामृत-आन्दोलन भगवान् कृष्ण द्वारा कही गई भगवद्गीता पर आधारित है और जो इस आन्दोलन से जुड़े हुए हैं उनके लिए अनिश्चितता का कोई प्रश्न ही नहीं है।

भगवान् कृष्ण को यहाँ पर आशिषाम् ईश कह कर भी सम्बोधित किया गया है। महापुरुष, मुनि तथा देवता सामान्य जीवों को ही आशीष दे सकते हैं, किन्तु स्वयं वे भगवान् से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। श्रीकृष्ण से आशीर्वाद पाये बिना कोई किसी अन्य को आशीर्वाद नहीं दे सकता। मनवे शब्द भी महत्त्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है, “मनु को।” मनु वैदिक साहित्य के स्वायम्भुव मनु हैं, जो कृष्ण के अवतार हैं। सारे मनु कृष्ण के शक्त्यावेश अवतार हैं (मन्वन्तर-अवतार )। ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु, एक मास में ४२०, एक वर्ष में ५,०४० और ब्रह्मा के जीवन-काल में कुल ५,०४,००० मनु होते हैं। चूँकि सारे मनु मानव-समाज के अधीक्षक होते हैं, अत: श्रीकृष्ण अन्तत: मानव-समाज के परम अधीक्षक हैं। मनवे का दूसरा अर्थ सभी प्रकार के मंत्रों की सिद्धि भी होता है। मंत्र बद्धजीव को बन्धन से छुड़ाता है, अत: हरे कृष्ण मंत्र का जप करने मात्र से ही मनुष्य का किसी भी स्थिति से उद्धार हो सकता है।

कारणात्मने—प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई कारण होता है। इस श्लोक में भाग्यवाद के सिद्धान्त का खंडन है। चूँकि हर वस्तु का कारण होता है, अत: भाग्य का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। चूँकि तथाकथित विज्ञानी तथा दार्शनिक वास्तविक कारण ढ़ूँढ पाने में असमर्थ रहते हैं, अत: वे वृथा ही बकते हैं कि सब संयोगवश घटित होता है। ब्रह्म-संहिता में कृष्ण को समस्त कारणों का कारण कहा गया है। यहाँ उन्हें कारणात्मने कह कर सम्बोधित किया गया है; अत: उनका व्यक्तित्व ही प्रत्येक वस्तु का मूल कारण या बीज है। जैसाकि वेदान्त सूत्र (१.१.२) में वर्णित है—जन्माद्यस्य यत:—परम सत्य समस्त सृष्टि का परम कारण है।

सांख्ययोगेश्वराय शब्द भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भगवद्गीता में श्रीकृष्ण को योगेश्वर कहा गया है। अकल्पनीय योगशक्तियों से संपन्न हुऐबिना कोई ईश्वर नहीं माना जा सकता। इस कलिकाल में जिन्हें थोड़ी भी योगशक्ति प्राप्त है वे अपने को ईश्वर कहते हैं, किन्तु ऐसे छद्म ईश्वर निरे मूर्ख माने जा सकते हैं, क्योंकि परम पुरुष श्रीकृष्ण ही समस्त योग-शक्तियों एवं सिद्धियों से समन्वित हैं। इस समय प्रचलित सांख्य योग पद्धति का प्रवर्तन नास्तिक कपिल द्वारा हुआ, किन्तु आदि सांख्ययोग पद्धति का प्रवर्तन श्रीकृष्ण के अवतार, देवहूति के पुत्र, कपिल द्वारा किया गया था। इसी प्रकार कृष्ण के अन्य अवतार दत्तात्रेय ने भी सांख्ययोग पद्धति की व्याख्या की। इस तरह श्रीकृष्ण समस्त सांख्ययोग पद्धतियों तथा योग-शक्तियों के स्त्रोत हैं।

पुरुषाय पुराणाय शब्द भी ध्यान देने योग्य हैं। ब्रह्म-संहिता में कृष्ण को आदि पुरुष के रूप में स्वीकार किया गया है। भगवद्गीता में उन्हें पुराण पुरुष अर्थात् सबसे प्राचीन पुरुष भी माना गया है। यद्यपि वे सभी महापुरुषों में सबसे पुराने हैं, तो भी वे सबों में तरुण, नवयौवन से पूर्ण भी हैं। एक और शब्द धर्माय भी महत्त्वपूर्ण है। चूँकि श्रीकृष्ण समस्त धर्मों के आदि प्रवर्तक हैं, अत: भागवत (६.३.१९) में कहा गया है—धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्। कोई भी नवीन धर्म प्रचारित नहीं कर सकता, क्योंकि श्रीकृष्ण द्वारा स्थापित धर्म पहले ही विद्यमान है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण हमें मूल धर्म की जानकारी देते हैं और सभी प्रकार के धर्मों का परित्याग करने को कहते हैं। वास्तविक धर्म तो उनके प्रति समर्पण है। महाभारत में भी कहा गया है—

ये च वेदविदो विप्रा ये चाध्यात्मविदो जना:।

ते वदन्ति महात्मानं कृष्णं धर्मं सनातनम् ॥

इसका सारांश यह है कि जिसने ठीक से वेदों का अध्ययन किया है, जो पूर्ण विप्र है अर्थात् वेदों का ज्ञाता है, आध्यात्मिक जीवन को समझता है, वही परम पुरुष श्रीकृष्ण को सनातन धर्म के रूप में बताता है। अत: शिवजी हमें सनातन धर्म के नियमों की शिक्षा देते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥