श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 43

 
श्लोक
शक्तित्रयसमेताय मीढुषेऽहङ्कृतात्मने ।
चेतआकूतिरूपाय नमो वाचो विभूतये ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
शक्ति-त्रय—तीन प्रकार की शक्तियाँ; समेताय—आगार को; मीढुषे—रुद्र को; अहङ्कृत-आत्मने—अहंकार के स्रोत; चेत:— ज्ञान; आकूति—कार्य करने की उत्सुकता; रूपाय—रूप को; नम:—मेरा नमस्कार है; वाच:—वाणी को; विभूतये—विभिन्न प्रकार के ऐश्वर्यों को ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, आप कर्ता, करण और कर्म—इन तीनों शक्तियों के नियामक हैं। अत: आप शरीर, मन तथा इन्द्रियों के परम नियन्ता हैं। आप अहंकार के परम नियन्ता रुद्र भी हैं। आप वैदिक आदेशों के ज्ञान तथा उनके अनुसार किए जाने वाले कर्मों के स्रोत हैं।
 
तात्पर्य
 प्रत्येक व्यक्ति मिथ्या अहंकार द्वारा निर्देशित होता है, अत: शिवजी मिथ्या अहंकार को भगवान् की कृपा से पवित्र करना चाह रहे हैं। चूँकि शिवजी या रुद्र ही अहंकार के नियन्ता हैं, इसलिए वे भगवान् की कृपा से अप्रत्यक्ष रूप से अपने को शुद्ध कर लेना चाहते हैं, जिससे उनका वास्तविक अहंकार जाग्रत हो सके। निस्सन्देह, आध्यात्मिक ज्ञान में रुद्र सदैव जागरूक रहते हैं, किन्तु वे हमारे लाभ के लिए ही इस प्रकार से स्तुति कर रहे हैं। निर्विशेषवादियों के लिए शुद्ध अहंकार तो अहं ब्रह्मास्मि—“मैं यह शरीर न होकर आत्मा हूँ” है। किन्तु वास्तव में आत्मा को भक्ति सम्बन्धी कार्य करने होते हैं। इसीलिए शिवजी वेदों के आदेशानुसार मन तथा कर्म से भगवान् की भक्ति में लगने के लिए प्रार्थना करते हैं। अहंकार को शुद्ध करने
की यही विधि है। चेत: का अर्थ है “ज्ञान”। बिना पूर्ण ज्ञान के पूर्ण रूप से कर्म नहीं किया जा सकता। ज्ञान का असली स्रोत वाच: या शब्द है, शब्द जो वैदिक आदेशों से प्राप्त होता है। यहा वाच: शब्द का अर्थ है वैदिक आदेश। सृष्टि की उत्पत्ति शब्द से ही हुई और यदि शब्द स्पष्ट तथा शुद्ध हो तो पूर्ण ज्ञान तथा पूर्ण कर्म प्रकट होते हैं। महामंत्र— हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे। हरे राम, हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे—के जप से यह सब सम्भव है। इस प्रकार शिवजी ज्ञान तथा वेदों के निर्देशानुसार कर्म की शुद्धि के द्वारा अपने शरीर, मन तथा कर्मों की शुद्धि के लिए बारम्बार प्रार्थना कर रहे हैं। वे भगवान् की प्रार्थना कर रहे हैं, जिससे उनका मन, इन्द्रियाँ तथा वाणी—ये सब केवल भक्ति की ओर ही उन्मुख हों।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥