श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 44

 
श्लोक
दर्शनं नो दिद‍ृक्षूणां देहि भागवतार्चितम् ।
रूपं प्रियतमं स्वानां सर्वेन्द्रियगुणाञ्जनम् ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
दर्शनम्—दर्शन; न:—हमारी; दिदृक्षूणाम्—देखने की इच्छा; देहि—कृपा करके दिखाएं; भागवत—भक्तों का; अर्चितम्— उनके द्वारा पूजित; रूपम्—स्वरूप; प्रिय-तमम्—सर्वाधिक प्रिय; स्वानाम्—अपने भक्तों का; सर्व-इन्द्रिय—सभी इन्द्रियाँ; गुण—गुण; अञ्जनम्—अत्यन्त मनोहर ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, मैं आपको उस रूप में देखने का इच्छुक हूँ, जिस रूप में आपके अत्यन्त प्रिय भक्त आपकी पूजा करते हैं। आपके अन्य अनेक रूप हैं, किन्तु मैं तो उस रूप का दर्शन करना चाहता हूँ जो भक्तों को विशेष रूप से प्रिय है। आप मुझ पर अनुग्रह करें और मुझे वह स्वरूप दिखलाएं, क्योंकि जिस रूप की भक्त पूजा करते हैं वही इन्द्रियों की इच्छाओं को पूरा कर सकता है।
 
तात्पर्य
 वेद-मंत्र या श्रुति में कहा गया है कि परमेश्वर सर्वकाम: सर्वगन्ध: सर्वरस: हैं। दूसरे शब्दों में, वे रसो वै स: कहलाते हैं अर्थात् सभी रसमय सम्बन्धों के स्रोत। हमारी विभिन्न इन्द्रियाँ हैं (देखने, स्वाद लेने, सूँघने, स्पर्श करने की शक्तियाँ इत्यादि) और हमारी इन सभी इन्द्रियों की इच्छाएँ तभी पूरी हो सकती हैं, जब इन्हें भगवान् की सेवा में लगा दिया जाये। हृषीकेण हृषीकेशसेवनं भक्तिरुच्यते—“भक्ति का अर्थ है समस्त इन्द्रियों को इन्द्रियों के स्वामी हृषीकेश में लगाना” (नारद पंचरात्र ) किन्तु भौतिक इन्द्रियों को भगवान् की भक्ति में नहीं लगाया जा सकता, अत: मनुष्य को सभी उपाधियों से मुक्त हो जाना चाहिए। सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्। मनुष्य को समस्त उपाधियों अथवा मिथ्या अहंकार से रहित होकर शुद्ध होना चाहिए। जब हम अपनी इन्द्रियों को भगवान् की सेवा में लगाते हैं, तो हमारी इच्छाएँ अथवा मनोवृत्तियाँ ठीक से पूरी होती हैं। अत: शिवजी भगवान् को उस रूप में देखना चाहते हैं, जो बौद्ध दार्शनिकों अथवा बौद्धों के लिए अकल्पनीय है।
निर्विशेषवादी तथा शून्यवादी भी परमेश्वर का रूप देखते हैं। बौद्ध मन्दिरों में ध्यानमग्न बुद्ध की मूर्तियाँ रहती हैं, किन्तु इनकी पूजा उस रूप में नहीं होती जैसी कि वैष्णव मन्दिरों में राधाकृष्ण, सीताराम या लक्ष्मीनारायण के रूपों की होती है। विभिन्न वैष्णव सम्प्रदायों में या तो राधाकृष्ण या लक्ष्मीनारायण की पूजा की जाती है। शिवजी भगवान् के पूर्ण रूप को उसी प्रकार देखना चाहते हैं जिस प्रकार भक्त देखना चाहते हैं। यहाँ पर रूपं प्रियतमं स्वानाम् का विशेष उल्लेख हुआ है, जिसका तात्पर्य है कि शिवजी उस रूप का दर्शन करना चाहते हैं, जो भक्तों को अत्यन्त प्रिय है। स्वानाम् महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भगवान् को केवल भक्त ही अत्यन्त प्रिय हैं। उन्हें ज्ञानी, योगी तथा कर्मी उतने प्रिय नहीं जितने कि भक्त प्रिय हैं। कर्मी भगवान् को अपनी आवश्यकता पूर्ति करने वाले के रूप में देखना चाहते हैं, ज्ञानी उनसे तादात्म्य होने के लिए उन्हें देखना चाहते हैं। और योगी उन्हें अंशत: अपने हृदय में परमात्मा रूप में स्थित देखना चाहते हैं, किन्तु भक्तजन उन्हें सर्वांग रूप में देखना चाहते हैं। जैसाकि ब्रह्म-संहिता (५.३०) में कहा गया है—

वेणुं क्वणन्तमरविन्ददलायताक्षं बर्हावतंसमसिताम्बुदसुन्दराङ्गम् ।

कन्दर्पकोटिकमनीयविशेषशोभं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

“मैं आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ जो अपने वंशीवादन में निपुण हैं, जिनके नेत्र खिले हुए कमलदलों के समान हैं, जिनका सिर मोरपंखों से अलंकृत है, जिनकी सुन्दरता नील-मेघों के समान है और जिनकी अद्वितीय शोभा करोड़ों कामदेवों को मोहित करती है।” इस प्रकार शिवजी की इच्छा है कि वे भगवान् के यहाँ वर्णित रूप का दर्शन करें अर्थात् उस रूप में जिस रूप में वे भागवतों या भक्तों के समक्ष प्रकट होते हैं। तात्पर्य यह कि शिवजी भगवान् के सर्वांग रूप को देखना चाहते हैं, निर्विशेषवादियों या शून्यवादियों की तरह नहीं। यद्यपि भगवान् विभिन्न रूपों में एक ही हैं (अद्वैतमच्युतमनादिम् ) तो भी गोपियों के साथ विहार करने वाला उनका रूप तथा ग्वालबालों के संग उनका तरुण रूप (किशोर मूर्ति ) अत्यन्त पूर्ण है। अत: वैष्णव लोग भगवान् के वृन्दावन की लीलाओं वाले रूप को प्रधान मानते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥