श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 47-48

 
श्लोक
प्रीतिप्रहसितापाङ्गमलकै रूपशोभितम् ।
लसत्पङ्कजकिञ्जल्कदुकूलं मृष्टकुण्डलम् ॥ ४७ ॥
स्फुरत्किरीटवलयहारनूपुरमेखलम् ।
शङ्खचक्रगदापद्ममालामण्युत्तमर्द्धिमत् ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
प्रीति—अनुग्रहपूर्ण; प्रहसित—हास्य; अपाङ्गम्—तिरछी चितवन; अलकै:—घुँघराले वालों से; रूप—सौंदर्य; शोभितम्— सुशोभित; लसत्—चमकता हुआ; पङ्कज—कमल का; किञ्जल्क—केशर; दुकूलम्—वस्त्र; मृष्ट—झलमलाते; कुण्डलम्— कान के आभूषण; स्फुरत्—चमचमाता; किरीट—मुकुट; वलय—कंकण; हार—गले की माला; नूपुर—पाँव का घुँघुरूदार आभूषण; मेखलम्—करधनी; शङ्ख—शंख; चक्र—चक्र; गदा—गदा; पद्म—कमल का फूल; माला—फूल की माला; मणि—मोती; उत्तम—श्रेष्ठ; ऋद्धि-मत्—इस कारण और भी सुन्दर ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् अपने मुक्त तथा दयापूर्ण हास्य तथा भक्तों पर तिरछी चितवन के कारण अनुपम सुन्दर लगते हैं। उनके बाल काले तथा घुँघराले हैं। हवा में उड़ता उनका वस्त्र कमल के फूलों में से उड़ते हुए केशर-रज के समान प्रतीत होता है। उनके झलमलाते कुण्डल, चमचमाता मुकुट, कंकण, बनमाला, नूपुर, करधनी तथा शरीर के अन्य आभूषण शंख, चक्र, गदा तथा कमल पुष्प से मिलकर उनके वक्षस्थल पर पड़ी कौस्तुभमणि की प्राकृतिक शोभा को बढ़ाते हैं।
 
तात्पर्य
 प्रहसितापाङ्ग शब्द जो कृष्ण की मुस्कान तथा चितवन का द्योतक है, गोपियों के साथ भगवान् कृष्ण के व्यवहार के प्रसंग में प्रयुक्त है। जब गोपियों के हृदय में वे मार्धुय रस की वृद्धि करते हैं, तो भगवान् सदैव विनोद मुद्रा
में रहते हैं। शंख, चक्र, गदा तथा पद्म या तो उनके हाथों में या हथेली में दिखाये जाते हैं। हस्तरेखा ज्योतिष के अनुसार जिसकी हथेली में ये चिह्न पाये जाते हैं, वह महापुरुष होता है और ये भगवान् को सूचित करने वाले हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥