श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 5

 
श्लोक
अन्तर्धानो नभस्वत्यां हविर्धानमविन्दत ।
य इन्द्रमश्वहर्तारं विद्वानपि न जघ्निवान् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
अन्तर्धान:—अन्तर्धान राजा; नभस्वत्याम्—अपनी पत्नी नभस्वती से; हविर्धानम्—हविर्धान नामक; अविन्दत—प्राप्त किया; य:—जो; इन्द्रम्—राजा इन्द्र को; अश्व-हर्तारम्—जो उसके पिता का घोड़ा चुरा रहा था; विद्वान् अपि—जानते हुए भी; न जघ्निवान्—नहीं मारा ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज अन्तर्धान के नभस्वती नामक एक दूसरी पत्नी थी जिससे उन्हें हविर्धान नामक एक अन्य पुत्र की प्राप्ति हुई। चूँकि महाराज अन्तर्धान अत्यन्त उदार थे, अत: उन्होंने यज्ञ से अपने पिता के घोड़े को चुराते हुए इन्द्रदेव को मारा नहीं।
 
तात्पर्य
 अनेक शास्त्रों तथा पुराणों से ज्ञात होता है कि स्वर्ग का राजा इन्द्र चोरी करने तथा अपहरण करने में अत्यन्त दक्ष था। वह मालिक की अनदेख में किसी भी वस्तु को चुरा सकता था और बिना पहचान में आए किसी की पत्नी को हर सकता था। एक बार उसने अपनी अन्तर्धान कला से गौतम मुनि की पत्नी के साथ बलात्कार किया। इसी प्रकार अदृश्य होकर उसने महाराज पृथु का घोड़ा चुरा लिया। यद्यपि मानव-समाज में ऐसे कार्य कुत्सित समझे जाते हैं, किन्तु इन्द्र ऐसे कार्यों से नीच अर्थात् भ्रष्ट हुआ नहीं समझा गया। यद्यपि अन्तर्धान को पता चल गया था कि राजा इन्द्र उसके पिता का घोड़ा चुराये ले जा रहा था, किन्तु उसने मारा नहीं, क्योंकि वह जानता था कि कभी-कभी अत्यन्त शक्तिशाली पुरुष भी ऐसा घृणित कार्य करते हैं, अत: इसकी ज्यादा परवाह नहीं करनी चाहिए। भगवद्गीता (९.३०) में स्पष्ट रूप से कहा गया है : अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स: ॥

भगवान् कहते हैं कि यदि भक्त कुत्सित कार्य भी करे तो उसे साधु ही समझना चाहिए, क्योंकि वह भगवान् की अविचल भक्ति करता है। भगवान् के भक्त कभी भी जान-बूझकर कोई पापकर्म नहीं करते, किन्तु कभी-कभी पुरानी आदतों के कारण वे कुछ घृणित कार्य कर बैठते हैं। ऐसे कार्यों को गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए, क्योंकि भगवान् के भक्त चाहे इस लोक में हों या स्वर्गलोक में, अत्यन्त शक्तिशाली होते हैं। यदि किसी कारणवश वे कोई घृणित कार्य कर बैठते हैं, तो इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए अपितु उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥