श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 50

 
श्लोक
पूररेचकसंविग्नवलिवल्गुदलोदरम् ।
प्रतिसङ्‌क्रामयद्विश्वं नाभ्यावर्तगभीरया ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
पूर—श्वास; रेचक—नि:श्वास; संविग्न—चलायमान; वलि—उदर में पडऩे वाली सिलवटें; वल्गु—सुन्दर; दल—बरगद के पत्ते के समान; उदरम्—पेट; प्रतिसङ्क्रामयत्—नीचे की ओर भँवरदार; विश्वम्—ब्रह्माण्ड; नाभ्या—नाभि; आवर्त—कुण्डली; गभीरया—गहराई में ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् का उदर (पेट) त्रिवली के कारण सुन्दर लगता है। गोल होने के कारण उनका उदर वटवृक्ष के पत्ते के समान जान पड़ता है और जब वे श्वास-प्रश्वास लेते हैं, तो इन सलबटों का हिलना-जुलना अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होता हैं। भगवान् की नाभि के भीतर की कुण्डली इतनी गहरी है मानो सारा ब्रह्माण्ड उसी में से उत्पन्न हुआ हो और पुन: उसी में समा जाना चाहता हो।
 
तात्पर्य
 यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भगवान् की नाभि से निकले कमलनाल से उत्पन्न हुआ। तब ब्रह्माजी ने इस कमलनाल के ऊपर आसीन होकर सारे ब्रह्माण्ड की रचना की। भगवान् की नाभि इतनी गहरी तथा चक्करदार है कि मानो सारा ब्रह्माण्ड उनकी शोभा से आकृष्ट होकर पुन: उसी के भीतर समा जाना चाहता है। नाभि तथा उदर की त्रिवली से भगवान् का शारीरिक सौन्दर्य बढ़ जाता है। भगवान् के शारीरिक अंगो का विवरण विशेषत: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्
का सूचक है। निर्विशेषवादी भगवान् के सुन्दर शरीर को नहीं समझ सकते, जिसका वर्णन शिवजी द्वारा की गई स्तुति में यहाँ हुआ है। यद्यपि निर्विशेषवादी शिवजी की पूजा में लगे रहते हैं, किन्तु शिवजी ने भगवान् विष्णु के शारीरिक अंगों का जो स्तवन किया है, उसे समझने में वे असमर्थ रहते हैं। भगवान् विष्णु को भागवत (११.५.३३) में शिवविरिञ्चिनुतम् कहा गया है, क्योंकि वे ब्रह्मा तथा शिवजी द्वारा सदैव पूजित हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥