श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 51

 
श्लोक
श्यामश्रोण्यधिरोचिष्णुदुकूलस्वर्णमेखलम् ।
समचार्वङ्‌घ्रिजङ्घोरुनिम्नजानुसुदर्शनम् ॥ ५१ ॥
 
शब्दार्थ
श्याम—श्याम वर्ण का; श्रोणि—कमर के निचे वाला भाग; अधि—अतिरिक्त; रोचिष्णु—सुहावना; दुकूल—वस्त्र; स्वर्ण— सुनहली; मेखलम्—करधनी; सम—समान; चारु—सुन्दर; अङ्घ्रि—चरणकमल; जङ्घ—पिंडली; ऊरु—जाँघें; निम्न— निचली; जानु—घुटने; सु-दर्शनम्—सुघड़, दर्शनीय ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् की कटि का अधोभाग श्यामल रंग का है और पीताम्बर से ढका है। उसमें सुनहली, जरीदार करधनी है। उनके एक समान चरणकमल, पिंडलियाँ, जाँघें तथा घुटने अनुपम सुन्दर हैं। निस्सन्देह, भगवान् का सम्पूर्ण शरीर अत्यन्त सुडौल प्रतीत होता है।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत (६.३.२०) में जिन बारह महाजनों का उल्लेख है उनमें शिवजी भी एक हैं। ये हैं—स्वयम्भू, नारद, शम्भु, कुमार, कपिल, मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्म, बलि, वैयासकी या शुकदेव गोस्वामी तथा यमराज। शिव की पूजा करने वाले निर्विशेषवादियों को चाहिए
कि भगवान् के दिव्य सच्चिदानन्द विग्रह के विषय में जानें। यहाँ पर शिवजी अत्यन्त कृपा करके भगवान् के अंगों का वर्णन कर रहे हैं। अत: निर्विशेषवादियों का यह तर्क कि भगवान् का कोई स्वरूप नहीं होता, किसी भी दशा में स्वीकार्य नहीं है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥