श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 52

 
श्लोक
पदा शरत्पद्मपलाशरोचिषा
नखद्युभिर्नोऽन्तरघं विधुन्वता ।
प्रदर्शय स्वीयमपास्तसाध्वसं
पदं गुरो मार्गगुरुस्तमोजुषाम् ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
पदा—चरणकमल द्वारा; शरत्—शरद ऋृतु; पद्म—कमल पुष्प; पलाश—दल; रोचिषा—अत्यन्त मनोहर; नख—नाखून; द्युभि:—तेज से; न:—हमारा; अन्त:-अघम्—मल; विधुन्वता—धो सकने वाला; प्रदर्शय—दिखलाइये; स्वीयम्—अपना; अपास्त—घटता हुआ; साध्वसम्—जगत का कष्ट; पदम्—चरणकमल; गुरो—हे गुरु; मार्ग—पथ; गुरु:—गुरु; तम: जुषाम्—अज्ञान के कारण कष्ट उठाने वाले व्यक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, आपके दोनों चरणकमल इतने सुन्दर हैं मानो शरत् ऋतु में उगने वाले कमल पुष्प के खिलते हुए दो दल हों। दरअसल आपके चरणकमलों के नाखूनों से इतना तेज निकलता है कि वह बद्धजीव के हृदय के सारे अंधकार को तुरन्त छिन्न कर देता है। हे स्वामी, मुझे आप अपना वह स्वरूप दिखलायें जो किसी भक्त के हृदय के अन्धकार को नष्ट कर देता है। मेरे भगवन्, आप सबों के परम गुरु हैं, अत: आप जैसे गुरु के द्वारा अज्ञान के अंधकार से आवृत सारे बद्धजीव प्रकाश प्राप्त कर सकते हैं।
 
तात्पर्य
 शिवजी ने इस प्रकार से भगवान् के स्वरूप का प्रामाणिक रूप से वर्णन किया है। अब वे भगवान् के चरणकमलों का दर्शन करना चाहते हैं। जब कोई भक्त भगवान् के दिव्य रूप का दर्शन करना चाहता है, तो वह अपना ध्यान सबसे पहले भगवान् के चरणकमलों पर केन्द्रित करता है। श्रीमद्भागवत को भगवान् की दिव्य वाणी माना जाता है और इसके बारह स्कंध भगवान् के दिव्य रूप के अनुसार विभाजित हैं। श्रीमद्भागवत के प्रथम दो स्कंध भागवत के चरण हैं, अत: शिवजी ने सुझाया है कि मनुष्य को पहले भगवान् के चरणों का दर्शन करना चाहिए। इसका यह भी अर्थ होता है कि यदि कोई गहन भाव से श्रीमद्भागवत पढऩा चाहता है, तो उसे पहले प्रथम तथा द्वितीय स्कंध पढऩे चाहिए।
भगवान् के चरणकमलों की सुन्दरता की उपमा शरदकालीन कमलदलों से दी गई है। प्रकृति का नियम है कि शरत् ऋतु में नदियों तथा सरोवरों का गंदा जल निर्मल हो जाता है। उस समय उनमें खिलने वाले कमल अत्यन्त चमकीले तथा सुन्दर लगते हैं। कमल पुष्प की तुलना भगवान् के चरणों से की गई है और कमलदलों की तुलना भगवान् के पाँव के नाखूनों से। भगवान् के चरणों के नाखून अत्यन्त चमकीले हैं जिसकी पुष्टि ब्रह्म-संहिता द्वारा होती है—आनन्दचिन्मयसदुज्ज्वल-विग्रहस्य— भगवान् के दिव्य शरीर का अंग-प्रत्यंग आनन्दचिन्मयसदुज्ज्वल हैं। इस तरह प्रत्येक अंग निरन्तर उज्ज्वल रहता है। जिस प्रकार धूप से संसार का अंधकार भाग जाता है, उसी तरह भगवान् के शरीर का तेज बद्धजीव के अन्त:करण के अंधकार को दूर कर देता है। दूसरे शब्दों में, जो कोई भी दिव्य विज्ञान को समझना चाहता है तथा भगवान् के दिव्य शरीर का दर्शन करना चाहता है उसे चाहिए कि वह पहले श्रीमद्भागवत के प्रथम तथा द्वितीय स्कन्धों को पढक़र भगवान् के चरणकमलों का दर्शन प्राप्त करने का यत्न करे। भगवान् के चरणकमलों का दर्शन होने से अन्त:करण से सभी प्रकार के सन्देह तथा भय दूर हो जाते हैं।

भगवद्गीता (१६.१) में कहा गया है कि आत्मिक उन्नति के लिए मनुष्य को निर्भय होना चाहिए। अभयं सत्त्वसंशुद्धि:। भय तो भौतिकता में निमग्न होने का प्रतिफल है। श्रीमद्भागवत (११.२.३७) में यह भी कहा गया है—भयं द्वितीयाभिनिवेशत: स्यात्—भय तो देहात्मबुद्धि से उपजता है। जब तक मनुष्य सोचता रहता है कि वह शरीर है तब तक वह डरता है और ज्योंही वह इस भौतिक बोध से मुक्त हो जाता है, तो वह तुरन्त ब्रह्मभूत अर्थात् स्वरूपसिद्ध होकर निर्भय हो जाता है। ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा (भगवद्गीता १८.५४)। निर्भय हुए बिना प्रसन्न नहीं रहा जा सकता। भक्त सदैव निर्भय तथा प्रसन्नमुख रहते हैं, क्योंकि वे निरन्तर भगवान् के चरणकमलों की सेवा में लगे रहते हैं। कहा भी गया है (भागवत १.२.२०)—

एवं प्रसन्नमनसो भगवद्भक्तियोगत:।

भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसङ्गस्य जायते ॥

भगवद्भक्ति योग के अभ्यास से मनुष्य निर्भय तथा प्रसन्न रहता है। जब तक मनुष्य निर्भय तथा प्रसन्न नहीं रहता, वह भगवद् विज्ञान को समझ नहीं पाता। भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसङ्गस्य जायते। यह श्लोक उनके लिए है, जो इस संसार के भय से पूर्ण रूप से मुक्त हो चुके हैं। इस प्रकार मुक्त होकर ही भगवान् के दिव्य रूप को समझा जा सकता है। अत: शिवजी सबों को भगवद् भक्तियोग का अभ्यास करने का उपदेश देते हैं। अगले श्लोकों से स्पष्ट हो जायेगा कि ऐसा करने से सचमुच मुक्त हुआ जा सकता है और आध्यात्मिक आनन्द उठाया जा सकता है।

कहा भी गया है—

ॐ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम: ॥

भगवान् परम गुरु हैं और परमेश्वर का प्रामाणिक प्रतिनिधि भी गुरु होता है। भगवान् अपने चरणकमलों के नाखूनों के तेज से भक्त को भीतर से प्रकाशित करते हैं और उनका प्रतिनिधि गुरु बाहर से करता है। भगवान् के चरणकमलों का ध्यान करने तथा सदा गुरु का उपदेश ग्रहण करने से ही आध्यात्मिक जीवन में प्रगति तथा वैदिक ज्ञान की प्राप्ति की जा सकती है—

यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।

तस्यैते कथिता ह्यर्था: प्रकाशन्ते महात्मन: ॥

इस प्रकार वेदों (श्वेताश्वर उपनिषद् ६.२३) का मत है कि भगवान् के चरणकमलों में तथा गुरु में अटल श्रद्धा होने पर ही वास्तविक वैदिक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥