श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 53

 
श्लोक
एतद्रूपमनुध्येयमात्मशुद्धिमभीप्सताम् ।
यद्भक्तियोगोऽभयद: स्वधर्ममनुतिष्ठताम् ॥ ५३ ॥
 
शब्दार्थ
एतत्—यह; रूपम्—रूप; अनुध्येयम्—ध्यान करना चाहिए; आत्म—स्व; शुद्धिम्—शुद्धि; अभीप्सताम्—इच्छा रखने वालों का; यत्—जो; भक्ति-योग:—भक्ति; अभय-द:—निर्भय कराने वाली; स्व-धर्मम्—अपने वृत्तिपरक कार्यों को; अनुतिष्ठताम्—करने में ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, जो लोग अपने जीवन को परिशुद्ध बनाना चाहते हैं, उन्हें उपर्युक्त विधि से आपके चरणकमलों का ध्यान करना चाहिए। जो अपने वर्ण के अनुरूप कार्य को पूरा करने की धुन में हैं और जो भय से मुक्त होना चाहते हैं, उन्हें भक्तियोग की इस विधि का अनुसरण करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 कहा गया है कि भगवान् का दिव्य नाम, स्वरूप, लीलाएँ तथा उनके संगीजनों को कोरी इन्द्रियों द्वारा नहीं जाना जा सकता; अत: इन इन्द्रियों को शुद्ध करने के लिए भक्ति करनी होती है, जिससे भगवान् के दर्शन हो सकें। किन्तु यहाँ पर यह बताया गया है कि जो भगवान् के चरणकमलों का निरन्तर ध्यान करते हैं उनकी इन्द्रियाँ भौतिक कल्मषों से पवित्र हो जाती हैं और वे भगवान् का प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं। इस युग में सामान्य लोगों के बीच “ध्यान” शब्द अत्यन्त लोकप्रिय है, किन्तु वे इसके वास्तविक अर्थ को नहीं समझते। किन्तु वैदिक साहित्य से पता चलता है कि योगीजन भगवान् के चरणकमलों का निरन्तर ध्यान करते हैं। ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिन: (भागवत १२.१३.१)। योगियों का यही वास्तविक कार्य है; भगवान् के चरणकमलों का ध्यान करना। अत: शिवजी उपदेश देते हैं कि जो वास्तव में परिशुद्ध होना चाहते हैं, उन्हें इस प्रकार के ध्यान में या योग में लगना चाहिए जिससे न केवल अन्त:करण में भगवान् का निरन्तर दर्शन किया जा सकता है वरन् साक्षात् उनका दर्शन हो सकता है और वैकुण्ठलोक या गोलोक वृन्दावन में उनका पार्षद बना जा सकता है।
स्वधर्मम् (यथा स्वधर्मम् अनुतिष्ठताम् में) शब्द सूचित करता है कि यदि जीवन में सचमुच सुरक्षा चाहिए तो —वर्णाश्रम धर्म जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के वृत्तिपरक कार्यों का द्योतक है और जो मानवता के लिए उपयुक्त व्यवस्था है—के साथ-साथ भक्तियोग ग्रहण करना चाहिए। सामान्यत: लोग सोचते हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के कर्मों को करने या कि ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यासी का कर्तव्य पूरा कर लेने से ही वे निर्भय हो जाते हैं या उन्हें निश्चित रूप से मोक्ष प्राप्त हो जाता है, किन्तु वस्तुत: जब तक इन सारे कर्मों को भक्तियोग के साथ-साथ सम्पन्न नहीं किया जाता तब तक कोई निर्भय नहीं हो सकता। भगवद्गीता में कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग आदि के वर्णन मिलते हैं, किन्तु जब तक भक्तियोग तक नहीं पहुँचा जाता, अन्य सारे योग जीवनसिद्धि को प्राप्त करने में समर्थ नहीं होते। दूसरे शब्दों में, भक्तियोग ही मोक्ष का एकमात्र साधन है। चैतन्य-चरितामृत में भी भगवान् चैतन्य तथा रामानन्द राय के मध्य इस जगत से मोक्ष प्राप्त करने के सम्बन्ध में जो वार्ता है, उससे यही निष्कर्ष निकलता है। उस वार्ता में रामानन्द राय ने वर्णाश्रम धर्म के पालन का प्रसंग उठाया तो भगवान् चैतन्य ने इंगित किया कि वर्णाश्रम धर्म केवल बाह्य है (एहो बाह्य ), अकेले वर्णाश्रम धर्म के कर्तव्यों के पालन से मोक्ष की कोई गारंटी नहीं है। अन्त में रामानन्द राय ने भक्तियोग का उल्लेख किया—स्थाने स्थिता: श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि: (भागवत १०.१४.३)। मनुष्य चाहे जिस अवस्था में रहे, यदि वह भक्तियोग करता है, जिसका शुभारम्भ भक्तों के मुख से भगवान् के दिव्य सन्देश को सुनने (श्रुतिगताम् ) से होता है, तो वह क्रमश: अजेय ईश्वर को जीत लेता है।

ईश्वर को अजेय माना जाता है, किन्तु जो व्यक्ति स्वरूपसिद्ध पुरुषों की वाणी को विनयपूर्वक सुनता है, वह अजेय को जीत लेता है। निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि मनुष्य को केवल वर्णाश्रम धर्म का ही पालन नहीं करना चाहिए, अपितु किसी स्वरुपसिद्ध पुरुष से सुनना आरम्भ करके भक्तियोग में भी लगना चाहिए। इस विधि से भक्त अजेय भगवान् को जीत सकेगा और इस भौतिक शरीर को त्यागने के बाद उनका पार्षद बनेगा।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥