श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 54

 
श्लोक
भवान् भक्तिमता लभ्यो दुर्लभ: सर्वदेहिनाम् ।
स्वाराज्यस्याप्यभिमत एकान्तेनात्मविद्गति: ॥ ५४ ॥
 
शब्दार्थ
भवान्—आप; भक्ति-मता—भक्त द्वारा; लभ्य:—प्राप्य; दुर्लभ:—प्राप्त कर पाना अत्यन्त कठिन; सर्व-देहिनाम्—अन्य समस्त देहधारियों (जीवात्माओं) का; स्वाराज्यस्य—स्वर्ग के राजा का; अपि—भी; अभिमत:—अन्तिम लक्ष्य; एकान्तेन—तादात्म्य के द्वारा; आत्म-वित्—स्वरूपसिद्ध का; गति:—गन्तव्य ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, स्वर्ग का राजा इन्द्र भी जीवन के परम लक्ष्य—भक्ति—को प्राप्त करने का इच्छुक रहता है। इसी प्रकार जो अपने को आपसे अभिन्न मानते हैं (अहं ब्रह्मास्मि), उनके भी एकमात्र लक्ष्य आप ही हैं। किन्तु आपको प्राप्त कर पाना उनके लिए अत्यन्त कठिन है जब कि भक्त सरलता से आपको पा सकता है।
 
तात्पर्य
 ब्रह्म-संहिता में आया है—वेदेषु दुर्लभमदुर्लमात्मभक्तौ। इससे सूचित होता है कि वैदिक साहित्य या वेदान्त दर्शन के अध्ययन-मात्र से जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर पाना और परम गंतव्य वैकुण्ठ लोक या गोलोक वृन्दावन तक पहुंच पाना कठिन है, किन्तु भक्तों को यह सर्वोच्च सिद्धि अवस्था सहज ही प्राप्य है। ब्रह्म-संहिता की उक्त पद का यही अर्थ है। शिवजी ने भी इस श्लोक में यही बात कही है। कर्मयोगियों, ज्ञान योगियों और ध्यान योगियों के लिए भगवान् को पाना अत्यन्त कठिन है। किन्तु जो भक्तियोगी हैं उनके लिए यह रंच मात्र भी दुष्कर नहीं है। स्वाराज्यस्य शब्द में स्वर से स्वर्गलोक और स्वाराज्य से स्वर्गलोक के राजा इन्द्र का बोध होता है। सामान्यत: सभी कर्मी स्वर्ग जाना चाहते हैं, किन्तु स्वयं स्वर्ग का राजा इन्द्र चाहता है कि वह भक्तियोग में निष्णात बने। जो लोग अपने आपको अहं ब्रह्मास्मि कहते हैं, वे भी वैकुण्ठलोक या गोलोक वृन्दावन पहुँच कर पूर्ण मोक्ष चाहते हैं। भगवद्गीता (१८.५५) में कहा गया है।—
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥

“भगवान् को यथारूप में केवल भक्ति द्वारा ही जाना जा सकता है और जब मनुष्य ऐसी भक्ति से भगवान् की पूर्ण चेतना में स्थित होता है, तो वह ईश्वर के धाम में प्रवेश कर सकता है।” अत: स्वर्ग में जाने के इच्छुक व्यक्ति को भक्तियोग के द्वारा भगवान् को जानने का प्रयत्न करना चाहिए। मात्र भक्तियोग के अभ्यास से मनुष्य भगवान् को वास्तव में समझ सकता है किन्तु भक्तियोग समझे बगैर मनुष्य दिव्य लोक में प्रवेश नहीं कर सकता। कोई भले ही स्वर्गलोक को प्राप्त हो ले या अपने को ब्रह्म समझ ले (अहं ब्रह्मास्मि ), किन्तु यह साक्षात्कार की इति नहीं है। मनुष्य को पहले भक्तियोग द्वारा भगवान् की स्थिति को समझना चाहिए, तभी उसे जीवन की वास्तविक सिद्धि प्राप्त हो सकेगी।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥