श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 55

 
श्लोक
तं दुराराध्यमाराध्य सतामपि दुरापया ।
एकान्तभक्त्या को वाञ्छेत्पादमूलं विना बहि: ॥ ५५ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उसको (तुमको); दुराराध्यम्—पूजा करना अत्यन्त कठिन; आराध्य—पूजा करके; सताम् अपि—सत्पुरुषों के लिए भी; दुरापया—प्राप्त कर पाना दुष्कर; एकान्त—शुद्ध; भक्त्या—भक्ति से; क:—ऐसा कौन है; वाञ्छेत्—चाहेगा; पाद-मूलम्— चरणकमल; विना—रहित; बहि:—बाहरी लोग ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, शुद्ध भक्ति कर पाना तो मुक्त पुरुषों के लिए भी कठिन है, किन्तु आप हैं कि एकमात्र भक्ति से ही प्रसन्न हो जाते हैं। अत: जीवन-सिद्धि का इच्छुक ऐसा कौन पुरुष होगा जो आत्म-साक्षात्कार की अन्य विधियों को अपनाएगा?
 
तात्पर्य
 सताम् शब्द अध्यात्मवादियों के लिए आया है। अध्यात्मवादी तीन प्रकार के होते हैं— ज्ञानी, योगी तथा भक्त। इन तीनों में से भगवान् के पास पहुँचने वाला सर्वाधिक उपयुक्त प्रतिभागी केवल भक्त है। यहाँ इस बात पर बल दिया गया है कि जो भक्ति नहीं करते, वे भगवान् के चरणकमलों की खोज नहीं करते हैं। कभी कभी मुर्ख लोग यह मानते
हैं कि ईश्वर किसी भी तरह से—कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग से—प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु यहाँ पर यह अभिमत स्पष्ट रूप से व्यक्त है कि केवल भक्तियोग से ही भगवत्कृपा प्राप्त हो सकती है। यहाँ पर दुराराध्य शब्द विशेष प्रयोजनीय है। भक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी विधि से भगवान् के चरणकमल प्राप्त करना दुष्कर है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥