श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 57

 
श्लोक
क्षणार्धेनापि तुलये न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिष: ॥ ५७ ॥
 
शब्दार्थ
क्षण-अर्धेन—आधा क्षण; अपि—भी; तुलये—तुलना कर सकता; न—कभी नहीं; स्वर्गम्—स्वर्गलोक; न—न तो; अपुन: भवम्—ब्रह्म से तादात्म्य; भगवत्—भगवान् के; सङ्गि—संगी; सङ्गस्य—संग का लाभ उठाने वाला; मर्त्यानाम्—बद्धजीव का; किम् उत—वहाँ क्या है; आशिष:—आशीर्वाद ।.
 
अनुवाद
 
 संयोग से भी यदि कोई क्षण भर के लिए भक्त की संगति पा जाता है, तो उसे कर्म और ज्ञान के फलों का तनिक भी आकर्षण नहीं रह जाता। तब उन देवताओं के वरदानों में उसके लिए रखा ही क्या है, जो जीवन और मृत्यु के नियमों के अधीन हैं?
 
तात्पर्य
 यहाँ कर्मियों, ज्ञानियों तथा भक्तों में से भक्त को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। श्रील प्रबोधानन्द सरस्वती का गीत है—कैवल्यं नरकायते त्रिदशपूराकाशपुष्पायते (चैतन्य-चन्द्रामृत)। कैवल्य का अर्थ है भगवान् के तेज में लीन होना तथा त्रिदशपूर देवताओं के निवासस्थान स्वर्गलोक का द्योतक है। इस प्रकार भक्त के लिए कैवल्य-सुख नरक के समान है, क्योंकि भक्त अपने व्यक्तित्व को खोकर ब्रह्मतेज में मिलने को आत्मघात मानता है। भक्त सदैव अपने व्यक्तित्व को बनाये रखना चाहता है, जिससे वह भगवान् की सेवा कर सके। दरअसल, वह स्वर्ग जाने को मायाजाल के अतिरिक्त
और कुछ नहीं मानता। भक्त के लिए क्षणिक सुख कोई अर्थ नहीं रखता। वह इतने उच्च पद पर रहता है कि उसे कर्म या ज्ञान के कर्मों में कोई रुचि नहीं रहती। आध्यात्मिक पद पर स्थित भक्त के लिए कर्म या ज्ञान के फल भी तुच्छ हैं। भक्तियोग ही भक्त को सारा सुख प्रदान करने के लिए पर्याप्त है। जैसाकि श्रीमद्भागवत (१.२.६) में कहा गया है—ययात्मा सुप्रसीदति। मनुष्य केवल भक्ति से पूर्ण रूप से सन्तुष्ट रह सकता है और यह भक्त की संगति से सम्भव है। शुद्ध भक्त से आशीर्वाद पाये बिना कोई न तो पूर्ण तुष्ट हो सकता है, न भगवान् की दिव्य स्थिति को ही समझ सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥