श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 58

 
श्लोक
अथानघाङ्‌घ्रेस्तव कीर्तितीर्थयो-
रन्तर्बहि:स्‍नानविधूतपाप्मनाम् ।
भूतेष्वनुक्रोशसुसत्त्वशीलिनां
स्यात्सङ्गमोऽनुग्रह एष नस्तव ॥ ५८ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—अत:; अनघ-अङ्घ्रे:—भगवान् के, जिनके चरण समस्त पापों को नष्ट करने वाले हैं; तव—तुम्हारी (आपकी); कीर्ति—कीर्ति महिमा; तीर्थयो:—पवित्र गंगा जल; अन्त:—भीतर; बहि:—बाहर; स्नान—स्नान करना; विधूत—धोया हुआ; पाप्मनाम्—मन की दूषित अवस्था; भूतेषु—सामान्य जीवों को; अनुक्रोश—कृपा या वर; सु-सत्त्व—पूर्णतया सतोगुण में; शीलिनाम्—ऐसे गुणों वालों का; स्यात्—हो; सङ्गम:—साथ, समागम; अनुग्रह:—कृपा; एष:—यह; न:—हमको; तव— तुम्हारी (आपकी) ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, आपके चरणकमल समस्त कल्याण के कारण हैं और समस्त पापों के कल्मष को विनष्ट करने वाले हैं। अत: मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप मुझे अपने भक्तों की संगति का आशीर्वाद दें, क्योंकि आपके चरणकमलों की पूजा करने से वे पूर्णतया शुद्ध हो चुके हैं और बद्धजीवों पर अत्यन्त कृपालु हैं। मेरी समझ में तो आपका असली आशीर्वाद यही होगा कि आप मुझे ऐसे भक्तों की संगति करने की अनुमति दें।
 
तात्पर्य
 गंगा-जल सभी प्रकार के पापों के फलों का निवारण करने वाला माना जाता है अर्थात् जब कोई व्यक्ति गंगा में स्नान करता है, तो उसके जीवन-भर के कल्मष धुल जाते हैं। गंगाजल की ऐसी महिमा का कारण यह है कि गंगाजी भगवान् के चरणकमलों से निकलती हैं। इसी प्रकार जो प्रत्यक्ष भगवान् के चरणकमल के सम्पर्क में रहते हैं और जो उनके गुणों का गायन करते हैं, वे सारे भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाते हैं। ऐसे शुद्ध भक्त ही सामान्य बद्धजीवों पर अनुग्रह कर सकते हैं। श्रील वृन्दावन दास ठाकुर का गीत है कि भगवान्
चैतन्य के भक्त इतने शक्तिशाली हैं कि उनमें से प्रत्येक भक्त एक ब्रह्माण्ड को बन्धन से मुक्ति दिला सकता है। दूसरे शब्दों में, भक्तों का कार्य है कि वे भगवान् की महिमा का उपेदश करें और सभी बद्धजीवों को शुद्ध सत्त्व पद तक पहुँचाएँ। यहाँ पर सु सत्त्व शब्द का अर्थ शुद्ध सत्त्व है, जो भौतिक सत्त्व से आगे की दिव्य अवस्था है। शिवजी अपनी विशिष्ट स्तुति के द्वारा हमें यह शिक्षा देते हैं कि सर्वोत्तम मार्ग यही है कि भगवान् विष्णु तथा उनके वैष्णव भक्तों की शरण में जाया जाये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥