श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 59

 
श्लोक
न यस्य चित्तं बहिरर्थविभ्रमं
तमोगुहायां च विशुद्धमाविशत् ।
यद्भक्तियोगानुगृहीतमञ्जसा
मुनिर्विचष्टे ननु तत्र ते गतिम् ॥ ५९ ॥
 
शब्दार्थ
न—कभी नहीं; यस्य—जिसका; चित्तम्—हृदय; बहि:—बाहरी; अर्थ—रुचि; विभ्रमम्—मोहित; तम:—अंधकार; गुहायाम्—कूप (गुफा) में; च—भी; विशुद्धम्—शुद्ध; आविशत्—प्रवेश किया; यत्—जो; भक्ति-योग—भक्ति; अनुगृहीतम्—कृपा प्राप्त; अञ्जसा—प्रसन्नतापूर्वक; मुनि:—विचारवान; विचष्टे—देखता है; ननु—फिर भी; तत्र—वहाँ; ते— तुम्हारे; गतिम्—कार्यकलाप ।.
 
अनुवाद
 
 जिसका हृदय भक्तियोग से पूर्ण रूप से पवित्र हो चुका हो तथा जिस पर भक्ति देवी की कृपा हो, ऐसा भक्त कभी भी अंधकूप सदृश माया द्वारा मोहग्रस्त नहीं होता। इस प्रकार समस्त भौतिक कल्मष से रहित होकर ऐसा भक्त आपके नाम, यश, स्वरूप, कार्य इत्यादि को अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक समझ सकता है।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत (३.२५.२५) में कहा गया है—
सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायना: कथा:।

तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥

शुद्ध भक्तों की संगति-मात्र से भगवान् के दिव्य नाम, यश, गुण तथा कार्य समझ में आ जाते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने बारम्बार कहा है—

‘साधु-संग’ ‘साधु-संग’—सर्व शास्त्रे कय।

लव-मात्र साधु-संगे सर्व-सिद्धि हय ॥

(चैतन्य-चरितामृत मध्य २२.५४) केवल शुद्ध भक्त की संगति करने से ही मनुष्य कृष्णचेतना में आश्चर्यजनक रूप से अग्रसर होता है। साधु-संग का अर्थ है हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करते हुए कृष्णचेतना (भक्ति) में लगे रहना और कृष्ण के लिए ही कार्य करना। हरे कृष्ण मंत्र के कीर्तन से मनुष्य शुद्ध हो जाता है, इसीलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस कीर्तन पर बल दिया है। चेतो-दर्पण-मार्जनम्—श्रीकृष्ण के नाम-जप से हृदय रूपी दर्पण स्वच्छ हो जाता है और भक्त को बाह्य बातों में अरुचि होने लगती है। जब मनुष्य भगवान् की माया के वश में रहता है, तो हृदय अशुद्ध रहता है; और जब हृदय शुद्ध नहीं रहता तो उसे यह नहीं दिखता कि वस्तुएँ भगवान् से किस प्रकार सम्बन्धित हैं। इदं हि विश्वं भगवानिवेतर: (भागवत १.५.२०)। जिसका हृदय शुद्ध है उसके लिए यह सारा दृश्य जगत भगवान् के अतिरिक्त कुछ नहीं है, किन्तु जिसका हृदय दूषित होता है उसे वस्तुएँ दूसरी तरह से दिखती हैं। अत: सत्संग से ही मनुष्य का हृदय पूरी तरह से शुद्ध हो सकता है।

जिसका हृदय शुद्ध होता है, वह कभी भी माया द्वारा आकृष्ट नहीं होता, क्योंकि माया प्रत्येक जीव को प्रकृति पर अधिकार जताने के लिए आकर्षित करती है। जब भक्त श्रवण, कीर्तन, स्मरण इत्यादि के द्वारा भक्ति करता रहता है, तो उसका शुद्ध ह्रदय विचलित नहीं होता। भक्ति करने की कुल नौ विधियाँ हैं। शुद्ध मानस वाला भक्त कभी भी विचलित नहीं होता। भक्तियोग में महामंत्र का जप करते हुए दस अपराधों से तथा श्रीविग्रह की पूजा करते हुए चौंसठ अपराधों से बचना चाहिए। जब भक्त इन समस्त विधि-विधानों का पालन करता है, तो भक्तिदेवी उस पर परम प्रसन्न होती हैं और तब वह किसी बाहरी वस्तु से विचलित नहीं होता। भक्त को मुनि भी कहते हैं। मुनि का अर्थ है “विचारवान।” भक्त उतना ही विचारवान होता है जितना कि एक अभक्त कल्पनाशील। अभक्त की कल्पना अशुद्ध रहती है, किन्तु भक्त के विचार शुद्ध होते हैं। कपिल तथा शुकदेव गोस्वामी भी मुनि कहलाते हैं, किन्तु व्यासदेव को महामुनि कहा जाता है। भक्त को तभी मुनि कहते हैं जब वह भगवान् को शुद्धतापूर्वक समझ सके। निष्कर्ष यह निकला कि जब मनुष्य का हृदय भक्तों के सत्संग से तथा भगवान् के कीर्तन तथा पूजा करते समय अपराधों से बचने से शुद्ध हो जाता है, तो भगवान् अपना दिव्य नाम, रूप तथा कार्यकलाप प्रकट करते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥