श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 60

 
श्लोक
यत्रेदं व्यज्यते विश्वं विश्वस्मिन्नवभाति यत् ।
तत् त्वं ब्रह्म परं ज्योतिराकाशमिव विस्तृतम् ॥ ६० ॥
 
शब्दार्थ
यत्र—जहाँ; इदम्—यह; व्यज्यते—प्रकट है; विश्वम्—ब्रह्माण्ड; विश्वस्मिन्—दृश्य जगत में; अवभाति—प्रकट होता है; यत्— जो; तत्—वह; त्वम्—तुम (आप); ब्रह्म—निर्गुण ब्रह्म; परम्—दिव्य; ज्योति:—तेज; आकाशम्—अकाश; इव—सदृश; विस्तृतम्—फैला हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, निर्गुण ब्रह्म सूर्य के प्रकाश अथवा आकाश की भाँति सर्वत्र फैला हुआ है। और जो सारे ब्रह्माण्ड भर में फैला है तथा जिसमें सारा ब्रह्माण्ड दिखाई देता है, वह निर्गुण ब्रह्म आप ही हैं।
 
तात्पर्य
 वैदिक शास्त्रों का कथन है कि प्रत्येक वस्तु ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ नहीं है। सारा दृश्य जगत ब्रह्मज्योति पर आश्रित है। किन्तु निर्विशेषवादी यह नहीं समझ पाते कि इतना विशाल दृश्य जगत एक व्यक्ति पर किस प्रकार से टिका है। इस प्रकार भगवान् की यह अकल्पनीय शक्ति उनकी समझ में नहीं आती; इसीलिए वे चकित रहते हैं और परमेश्वर को व्यक्ति रूप में सदा ही अस्वीकार करते रहते हैं। इस भ्रम को शिवजी स्वयं यह कर दूर करते हैं कि सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त निर्गुण ब्रह्म भगवान् के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यहाँ यह स्पष्ट कहा गया है कि भगवान् अपने ब्रह्म स्वरूप के कारण धूप के समान सर्वव्यापी हैं। यह उदाहरण समझ पाना अत्यन्त सरल है। सारे लोक सूर्य के प्रकाश (धूप) पर टिके हैं, तो भी धूप तथा धूप का स्रोत (सूर्य) इन लोकों से पृथक् हैं। इसी प्रकार आकाश या वायु भी सर्वत्र फैले हैं। वायु घट के भीतर भी है और गन्दे तथा पवित्र स्थानों का भी एक जैसा स्पर्श करती है। किन्तु प्रत्येक दशा में आकाश अदूषित रहता है। इसी प्रकार धूप भी अपवित्र तथा पवित्र स्थानों का स्पर्श करती है और यद्यपि ये दोनों सूर्य द्वारा ही उत्पन्न हैं, किन्तु प्रत्येक दशा में सूर्य समस्त गन्दी वस्तुओं से पृथक् रहता है। इसी प्रकार भगवान् सर्वत्र स्थित हैं। इस जगत में पवित्र तथा अपवित्र दोनों प्रकार की वस्तुएँ हैं, किन्तु शास्त्रों के अनुसार पवित्र वस्तुएँ भगवान् के सामने का भाग तथा अपवित्र वस्तुएँ भगवान् का पिछला भाग बताई गई हैं। भगवद्गीता (९.४) में भगवान् स्पष्ट कहते हैं—
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित: ॥

“मेरे अव्यक्त रूप द्वारा यह सारा ब्रह्माण्ड व्याप्त है। सारे जीव मुझमें स्थित हैं, किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ।”

भगवद्गीता का यह श्लोक बताता है कि भगवान् अपने ब्रह्म स्वरूप के कारण सर्वत्र व्याप्त हैं। प्रत्येक वस्तु उन पर टिकी है, किन्तु वे उसमें नहीं रहते। इससे निष्कर्ष यह निकला कि बिना भक्तियोग के निर्विशेषवादी भी ब्रह्मतत्त्व को नहीं समझ सकते। वेदान्त सूत्र का कथन है—अथातो ब्रह्मजिज्ञासा। इसका अर्थ है कि हमें ब्रह्म, परमात्मा या परब्रह्म को समझना चाहिए। श्रीमद्भागवत में भी परम सत्य को अद्वितीय बताया गया है, किन्तु उनका बोध तीन रूपों में किया जाता है—निर्गुण ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा भगवान्। भगवान् ही अन्तिम सत्य हैं और इस श्लोक में शिवजी पुष्टि करते हैं कि परम सत्य व्यक्ति हैं। वे स्पष्ट कहते हैं—तत्त्वं ब्रह्म परं ज्योतिराकाशमिव विस्तृतम्। यहाँ एक सामान्य उदाहरण दिया जा रहा है—एक सफल व्यापारी के कई फैक्टरियाँ तथा आफिस हैं और उसके आदेश से सारे कार्य चलते हैं। यदि कोई यह कहे कि सारा व्यापार अमुक व्यक्ति पर निर्भर है, तो उसके कहने का प्रयोजन यह नहीं है कि सारी फैक्टरियाँ तथा आफिस उस व्यक्ति के सर पर टिके हैं। अपितु इसका अर्थ यह है कि वह अपने मस्तिष्क से या अपनी शक्ति के विस्तार द्वारा अबाध रूप से अपना व्यापार चला रहा है। इसी प्रकार भगवान् की बुद्धि तथा शक्ति से भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत का कार्य चल रहा है। यहाँ पर अद्वैतवाद का जो सिद्धान्त बताया गया है, वह इस तथ्य से मेल खाता है कि समस्त शक्ति के परम स्रोत भगवान् कृष्ण हैं। इसका स्पष्ट वर्णन हुआ है। यह भी बताया गया है कि श्रीकृष्ण के निर्गुण स्वरूप को कैसे जाना जा सकता है—

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययो:।

प्रणव: सर्ववेदेषु शब्द: खे पौरुषं नृषु ॥

“हे कुन्तीपुत्र! मैं जल का स्वाद हूँ, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूँ; वैदिक मंत्रों में ॐ अक्षर हूँ, मैं आकाश में शब्द और मनुष्य में पौरुष हूँ।” (भगवद्गीता ७.८) इस प्रकार कृष्ण को प्रत्येक वस्तु की योग शक्ति माना जा सकता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥