श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 61

 
श्लोक
यो माययेदं पुरुरूपयासृजद्
बिभर्ति भूय: क्षपयत्यविक्रिय: ।
यद्भेदबुद्धि: सदिवात्मदु:स्थया
त्वमात्मतन्त्रं भगवन् प्रतीमहि ॥ ६१ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; मायया—माया से; इदम्—यह; पुरु—अनेक; रूपया—रूपों के द्वारा; असृजत्—उत्पन्न किया; बिभर्ति—पालन करता है; भूय:—पुन:; क्षपयति—संहार करता है; अविक्रिय:—बिना किसी परिवर्तन के; यत्—जो; भेद-बुद्धि:—अन्तर करने की बुद्धि; सत्—शाश्वत; इव—सदृश; आत्म-दु:स्थया—अपने आपको कष्ट देते हुए; त्वम्—तुमको; आत्म-तन्त्रम्— पूर्णतया स्वतंत्र; भगवन्—हे भगवन्; प्रतीमहि—मैं समझता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, आपकी शक्तियाँ अनेक हैं और वे नाना रूपों में प्रकट होती हैं। आपने ऐसी ही शक्तियों से इस दृश्य जगत की उत्पत्ति की है और यद्यपि आप इसका पालन इस प्रकार करते हैं मानो यह चिरस्थायी हो, किन्तु अन्त में आप इसका संहार कर देते हैं। यद्यपि आप कभी-भी ऐसे परिवर्तनों द्वारा विचलित नहीं होते, किन्तु जीवात्माएँ इनसे विचलित होती रहती हैं, इसलिए वे इस दृश्य जगत को आपसे भिन्न अथवा पृथक् मानती हैं। हे भगवन्, आप सर्वदा स्वतंत्र हैं और मैं तो इसे प्रत्यक्ष देख रहा हूँ।
 
तात्पर्य
 यहाँ स्पष्ट बताया गया है कि श्रीकृष्ण की अनेक शक्तियाँ हैं, जिन्हें तीन वर्गों में रखा जा सकता है—बहिरंगा शक्ति, अन्तरंगा शक्ति तथा तटस्था शक्ति। दृश्य जगत भी भिन्न-भिन्न हैं—यथा आध्यात्मिक जगत (वैकुण्ठ) तथा भौतिक जगत। इसी प्रकार जीवात्माएँ भी भिन्न-भिन्न प्रकार की हैं—कुछ बद्ध हैं और कुछ नित्य मुक्त। नित्यमुक्त जीवात्माएँ कभी-भी माया के सम्पर्क में नहीं आतीं। किन्तु इस जगत में कुछ जीवात्माएँ बद्ध होती हैं और वे अपने को परमेश्वर से विलग मानती हैं। माया के सम्पर्क में रहने से इनका अस्तित्व सदा संकट में रहता है। सदैव संकट में रहने के कारण बद्धजीव माया को अत्यन्त कष्टप्रद समझता है। एक वैष्णव कवि ने इस तथ्य को इस प्रकार व्यक्त किया है—
कृष्ण भुलि सेइ जीव अनादि-बहिर्मुख।

अतएव माया तारे देय संसार-दु:ख ॥

जब जीवात्मा परमात्मा को भूल जाता है और परमात्मा की नकल करते हुए स्वतंत्र रूप से भोग करना चाहता है, तो वह अपने को मिथ्या ही भोक्ता मान बैठता है और परमात्मा से विलग हो जाता है। अत: माया पराशक्ति जीवात्मा के लिए अत्यन्त कष्टप्रद है, किन्तु परमात्मा के लिए रंचमात्र भी नहीं। परमात्मा के लिए माया तथा पराशक्ति एकसमान हैं। इस श्लोक में शिवजी बताते हैं कि माया कभी भी भगवान् के लिए कष्टप्रद नहीं होती। वे परम स्वतंत्र हैं, किन्तु जीवात्मा के स्वतंत्र न होने से माया कष्टप्रद है। फलत: अपरा शक्ति भेद उत्पन्न करती है।

किन्तु मायावादी विचारक इसे नहीं समझ सकते, इसलिए वे माया से मुक्ति चाहते हैं। किन्तु वैष्णव चिन्तक भगवान् को भलीभाँति समझता है, अत: माया में उसे किसी प्रकार का उपद्रव नहीं दिखता। इसका कारण यही है कि वह भगवान् की सेवा में माया का उपयोग करना जानता है। अपराध विभाग तथा प्रशासन विभाग भले ही नागरिकों की दृष्टि में पृथक्-पृथक् प्रतीत हों, किन्तु सरकार के लिए तो ये दोनों विभाग एक जैसे हैं। अपराध विभाग अपराधियों के लिए कष्टप्रद है, किन्तु आज्ञाकारी नागरिकों के लिए नहीं। इसी प्रकार यह माया भले ही बद्धजीव के लिए कष्टप्रद हो, किन्तु भगवान् की सेवा में लगे हुए मुक्तजीवों से इसका कोई प्रयोजन नहीं रहता। पुरुष अवतार महाविष्णु के माध्यम से भगवान् ने इस समग्र दृश्य जगत की उत्पत्ति की। केवल श्वास से ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति करके वे भगवान् विष्णु के रूप में दृश्य जगत का पालन करते हैं। तब संकर्षण रूप में वे उसका संहार करते हैं। सृष्टि, पालन तथा संहार के बावजूद भगवान् अप्रभावित (निर्लिप्त) बने रहते हैं। भगवान् के ये कार्यकलाप तुच्छ जीवों के लिए भले ही उद्विग्न करने वाले हों, किन्तु अत्यन्त महान् होने के कारण भगवान् पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भेद-बुद्धि द्वारा दृष्टिहीन हुए बिना शिवजी या कोई भी शुद्ध भक्त इसे स्पष्ट देख सकता है। भक्त के लिए भगवान् परमात्मा हैं और चूँकि वे परम शक्तिमान हैं, अत: उनकी शक्तियाँ भी दिव्य होती हैं। भक्त के लिए कुछ भी भौतिक नहीं होता, क्योंकि भौतिक जगत का अर्थ है भगवान् को विस्मृत करना।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥