श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 62

 
श्लोक
क्रियाकलापैरिदमेव योगिन:
श्रद्धान्विता: साधु यजन्ति सिद्धये ।
भूतेन्द्रियान्त:करणोपलक्षितं
वेदे च तन्त्रे च त एव कोविदा: ॥ ६२ ॥
 
शब्दार्थ
क्रिया—कार्य; कलापै:—विधियों से; इदम्—यह; एव—निश्चय ही; योगिन:—योगीजन; श्रद्धा-अन्विता:—श्रद्धा तथा दृढ़ निश्चय से; साधु—उचित रीति से; यजन्ति—पूजा करते हैं; सिद्धये—सिद्धि के लिए; भूत—भौतिक शक्ति; इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; अन्त:-करण—हृदय; उपलक्षितम्—के द्वारा लक्षित; वेदे—वेदों में; च—भी; तन्त्रे—शास्त्रों में; च—भी; ते—आप; एव— निश्चय ही; कोविदा:—पटु, मर्मज्ञ ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, आपका विराट रूप, इन्द्रियों, मन, बुद्धि, अहंकार (जो भौतिक हैं) तथा आपके अंश रूप सर्व नियामक परमात्मा इन सभी पाँच तत्त्वों से बना है। भक्तों के अतिरिक्त अन्य योगी—यथा कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगी—अपने-अपने पदों में अपने-अपने कार्यों द्वारा आपकी पूजा करते हैं। वेदों में तथा शास्त्रों में जो वेदों के निष्कर्ष हैं, कहा गया है कि केवल आप ही पूज्य हैं। सभी वेदों का यही अभिमत है।
 
तात्पर्य
 पिछले श्लोक में शिवजी भगवान् के उस रूप का दर्शन करना चाहते थे जिसमें भक्तों की रुचि सदा रहती है। भौतिक जगत में भगवान् के अन्य रूप भी प्रकट होते हैं जिसमें ब्रह्मा तथा अन्य देवता सम्मिलित हैं और भौतिकतावादी लोग इन्हीं की पूजा करते हैं। श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कंध के तृतीय अध्याय (श्लोक १०) में कहा गया है कि जो लोग भौतिक लाभ चाहते हैं उन्हें विभिन्न देवताओं की पूजा करनी चाहिए। निष्कर्ष रूप में भागवत् की संस्तुति है :- अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥

भक्त, ज्ञानी (मोक्षकाम) तथा कर्मी (सर्वकाम) सभी भगवान् विष्णु की पूजा करना चाहते हैं। यज्ञ करते समय, जैसाकि यहाँ कहा गया है (यज्ञकामै: ), मनुष्य को स्मरण रखना चाहिए कि देवता परमेश्वर के दूत हैं। वास्तव में पूजनीय तो यज्ञेश्वर विष्णु हैं। इस प्रकार भले ही वैदिक तथा तांत्रिक यज्ञों में विभिन्न देवों की पूजा की जाती हो, यज्ञ के वास्तविक लक्ष्य तो भगवान् विष्णु हैं। अत: भगवद्गीता (९.२३) में उल्लेख है—

येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता:।

तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥

“हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य जो कुछ भी अन्य देवों को अर्पित करे, वह वास्तव में मेरे लिए ही होता है, किन्तु वह बिना वास्तविक ज्ञान के अर्पित किया गया होता है।”

इस प्रकार विभिन्न देवताओं के उपासक भी भगवान् की ही पूजा करते हैं, किन्तु वे नियामक सिद्धान्तों के विपरीत ऐसा करते हैं। अनुष्ठानों का प्रयोजन भगवान् विष्णु को तुष्ट करना है। विष्णुपुराण (३.८.९) में इसी बात की पुष्टि की गई है—

वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण पर: पुमान्।

विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत् तत्तोषकारणम् ॥

यहाँ पर यह स्पष्ट उल्लेख है कि कर्मी, ज्ञानी या योगी—वस्तुत: हर कोई-यदि वह वेदों तथा तंत्रों का वास्तव में मर्मज्ञ होता है, तो वह भगवान् विष्णु को ही पूजता है। कोविदा: शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह भगवान् के भक्तों का सूचक है। केवल भक्त ही इस तथ्य को भली-भाँति जानते हैं कि भगवान् विष्णु सर्वव्यापी हैं। भौतिक शक्ति (माया) के अन्तर्गत वे पाँच तत्त्वों तथा मन, बुद्धि एवं मिथ्या अहंकार द्वारा व्यक्त हैं। उन्हें एक अन्य शक्ति—जीव—के द्वारा भी प्रदर्शित किया जाता है और भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत में जितने भी प्राकट्य हैं, वे सब मिलकर भगवान् की विभिन्न शक्तियों को ही प्रदर्शित करते हैं। निष्कर्ष यह निकला कि भगवान् एक हैं और उनका विस्तार हर वस्तु में होता है। इसे वैदिक सूक्ति—सर्वं खल्विदं ब्रह्म—से समझा जा सकता है। जो इसे जानता है, वह भगवान् विष्णु की आराधना में ही अपनी समस्त शक्ति को केन्द्रित करता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥