श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 63

 
श्लोक
त्वमेक आद्य: पुरुष: सुप्तशक्ति-
स्तया रज:सत्त्वतमो विभिद्यते ।
महानहं खं मरुदग्निवार्धरा:
सुरर्षयो भूतगणा इदं यत: ॥ ६३ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम्—तुम; एक:—अकेले; आद्य:—आदि; पुरुष:—पुरुष; सुप्त—सोई हुई; शक्ति:—शक्ति; तया—उससे; रज:—रजोगुण; सत्त्व—सतोगुण; तम:—अज्ञान, तमोगुण; विभिद्यते—अनेक भेद हो जाते हैं; महान्—समष्टि शक्ति; अहम्—अहंकार; खम्— आकाश; मरुत्—वायु; अग्नि—अग्नि; वा:—जल; धरा:—पृथ्वी; सुर-ऋषय:—देवता तथा ऋषिगण; भूत-गणा:—जीव; इदम्—यह सब; यत:—जिससे ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, आप समस्त कारणों के कारण एकमात्र परम पुरुष हैं। इस भौतिक जगत की सृष्टि के पूर्व आपकी भौतिक शक्ति सुप्त रहती है, किन्तु जब आपकी शक्ति गतिमान होती है, तो आपके तीनों गुण—सत्त्व, रज तथा तमो गुण—क्रिया करते हैं। फलस्वरूप समष्टि भौतिक शक्ति अर्थात् अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी तथा विभिन्न देवता एवं ऋषिगण प्रकट होते हैं। इस प्रकार भौतिक जगत की उत्पत्ति होती है।
 
तात्पर्य
 यदि सारी सृष्टि एक है अर्थात् परमेश्वर या विष्णु के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, तो फिर मर्मज्ञ अध्यात्मवादी क्योंकर इस श्लोक में दी गई कोटियों का उल्लेख करते हैं? विद्वान् तथा विशेषज्ञ क्योंकर पदार्थ तथा आत्मा में भेद मानते हैं? इन प्रश्नों के उत्तरस्वरूप शिवजी कहते हैं कि आत्मा तथा पदार्थ विचारकों द्वारा निर्मित नहीं हैं, अपितु भगवान् विष्णु द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं, जैसाकि इस श्लोक में कहा गया है—त्वमेक आद्य: पुरुष:। यद्यपि भौतिक तथा आध्यात्मिक कोटियाँ भगवान् द्वारा ही बनाई गई हैं, किन्तु भगवान् की सेवा में निरत जीवों के लिए ऐसा कोई विभेद नहीं होता। जो लोग भगवान् की नकल करके भोक्ता बनना चाहते हैं उनके लिए भौतिक जगत ही सब कुछ है। दरअसल यह भौतिक जगत सभी के सृष्टा आदि भगवान् की विस्मृति ही है। पदार्थ तथा आत्मा का अन्तर भगवान् की सुप्त शक्ति का फल है, क्योंकि भगवान् उन जीवों को कुछ सुविधा प्रदान करना चाहते हैं, जो भगवान् के भोगों का अनुकरण करना चाहते हैं। केवल ऐसे जीवों के लिए ही भगवान् की सुप्त शक्ति से इस भौतिक जगत की उत्पत्ति हुई है। उदाहरणार्थ, कभी-कभी बच्चे अपनी माता के अनुकरण पर रसोईघर में भोजन पकाना चाहते हैं। ऐसे अवसर पर माता कुछ खिलौने लाकर रख देती है, जिससे बच्चे भोजन पकाने में लग जाँय और उसका अनुकरण कर सकें। इसी प्रकार जब कुछ जीव भगवान् के कार्यों का अनुकरण करना चाहते हैं, तो उनके लिए भगवान् इस दृश्य जगत की उत्पत्ति करता है। इस प्रकार भौतिक सृष्टि भगवान् की भौतिक शक्ति (माया) द्वारा उत्पन्न होती है। भगवान् के दृष्टिपात करने से ही माया गतिशील होती है। उस समय प्रकृति के तीनों गुण गतिशील हो जाते हैं और सर्वप्रथम भौतिक शक्ति का प्राकट्य महत् तत्त्व के रूप में, फिर क्रमश: अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी के रूप में होता है। सृष्टि के पश्चात् जीव दृश्य जगत में घुल-मिल जाते हैं और वे ब्रह्मा तथा सप्त ऋषियों के रूप में बाहर निकलते हैं, फिर विभिन्न देवता प्रकट होते हैं। देवताओं से मनुष्य, पशु, वृक्ष, पक्षी तथा अन्य सभी पदार्थ निकलते हैं। किन्तु आदि कारण तो भगवान् हैं जिसकी पुष्टि यहाँ पर—त्वमेक आद्य: पुरुष: द्वारा—हुई है। ब्रह्म-संहिता (५.१) में भी इसकी पुष्टि मिलती है—
ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्दविग्रह:।

अनादिरादिर्गोविन्द: सर्वकारणकारणम् ॥

जो लोग भौतिक शक्ति अर्थात् माया के वश में हैं, वे यह नहीं समझ सकते कि प्रत्येक वस्तु का उद्भव भगवान् कृष्ण से हुआ है। इसका सारांश वेदान्त की इस उक्ति जन्माद्यस्य यत: (वेदान्त सूत्र १.१.२)—में मिलता है। भगवद्गीता (१०.८) में कृष्ण ने भी इसी की पुष्टि की है—

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते।

इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता: ॥

“मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का उद्गम हूँ। प्रत्येक वस्तु मुझी से उद्भूत है। बुद्धिमान लोग इसे भली भाँति जानते हुए मेरी सेवा में रत होते हैं और अपने अन्त:करण से मेरी पूजा करते हैं।”

जब श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे प्रत्येक वस्तु के उद्गम हैं (अहं सर्वस्य प्रभवो ), तो उनका अभीष्ट यही रहता है कि वे ब्रह्मा, शिव, पुरुष अवतारों, भौतिक जगत तथा इस जगत के समस्त जीवों के भी उद्गम हैं। वस्तुत: प्रभव (सृष्टि) शब्द इस भौतिक जगत के लिए ही प्रयुक्त है, क्योंकि आध्यात्मिक जगत तो शाश्वत है, उसकी उत्पत्ति का प्रश्न ही नहीं उठता। चतु:श्लोकी श्रीमद्भागवत में कृष्ण कहते हैं—अहमेवासमेवाग्रे—“मैं सृष्टि के पूर्व विद्यमान था” (भागवत २.९.३३)। वेदों में भी कहा गया है—एको नारायण:आसीत्—“सृष्टि के पूर्व केवल नारायण थे।” शंकराचार्य ने भी इसी की पुष्टि की है। नारायण: परोऽव्यक्तात्—“नारायण इस सृष्टि से परे हैं” (गीताभाष्य )। चूँकि नारायण के सारे कार्य आध्यात्मिक हैं, अत: जब उन्होंने कहा, “सृष्टि हो” तो वह सृष्टि आध्यात्मिक थी। “भौतिक” शब्द तो उनके मनों में विद्यमान हैं, जो यह भूल गये हैं कि नारायण ही आदि कारण हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥