श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 65

 
श्लोक
स एष लोकानतिचण्डवेगो
विकर्षसि त्वं खलु कालयान: ।
भूतानि भूतैरनुमेयतत्त्वो
घनावलीर्वायुरिवाविषह्य: ॥ ६५ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; एष:—यह; लोकान्—सारे लोकों को; अति—अत्यधिक; चण्ड-वेग:—प्रचण्ड वेग; विकर्षसि—नष्ट करता है; त्वम्—तुम; खलु—फिर भी; काल-यान:—समय आने पर; भूतानि—सभी जीव; भूतै:—अन्य जीवों से; अनुमेय-तत्त्व:— परम सत्य का अनुमान लगाया जा सकता है; घन-आवली:—बादल; वायु:—वायु; इव—सदृश; अविषह्य:—असह्य ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, आपकी परम सत्ता का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं किया जा सकता, किन्तु संसार की गतिविधियों को देखकर कि समय आने पर सब कुछ विनष्ट हो जाता है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। काल का वेग अत्यन्त प्रचण्ड है और प्रत्येक वस्तु किसी अन्य वस्तु के द्वारा विनष्ट होती जा रही है—जैसे एक पशु दूसरे पशु द्वारा निगल लिया जाता है। काल प्रत्येक वस्तु को उसी प्रकार तितर-बितर कर देता है, जिस प्रकार आकाश में बादलों को वायु छिन्न-भिन्न कर देती है।
 
तात्पर्य
 प्रकृति के नियमानुसार विनाशलीला चलती रहती है। इस संसार के भीतर कुछ भी स्थायी नहीं है, यद्यपि विज्ञानी, विचारक, कर्मी तथा अन्य लोग वस्तुओं को स्थायी बनाने का प्रयास कर रहे हैं। एक सिरफिरे विज्ञानी ने हाल ही में घोषित किया है कि अन्तत: जीवन को विज्ञान के द्वारा स्थायी बना दिया जाएगा। कुछ तथाकथित विज्ञानी प्रयोगशाला में जीवों का निर्माण करने का भी प्रयास कर रहे हैं। इस तरह प्रत्येक व्यक्ति येन-केन-प्रकारेण भगवान् के अस्तित्व एवं उसकी परम सत्ता को नकारने में व्यस्त है। फिर भी भगवान् इतने शक्तिमान हैं कि वे मृत्यु के रूप में प्रत्येक वस्तु को नष्ट कर देते हैं। जैसाकि श्रीकृष्ण भगवद्गीता (१०.३४) में कहते हैं—मृत्यु: सर्वहरश्चाहम्—“मैं सबों को कालकवलित करने वाली मृत्यु हूँ।” भगवान् नास्तिकों के लिए मृत्यु-तुल्य हैं, क्योंकि भौतिक संसार में वे जो कुछ एकत्र करते हैं उसे भगवान् उठा लेता है। प्रह्लाद का पिता हिरण्यकशिपु भगवान् के अस्तित्व को नहीं मानता था और वह अपने पाँच वर्ष के पुत्र को ही मार डालना चाहता
था, क्योंकि उस बालक की भगवान् पर अटूट श्रद्धा थी। किन्तु समय आने पर भगवान् नृसिंहदेव के रूप में प्रकट हुए और पुत्र के समक्ष ही हिरण्यकशिपु का वध कर दिया। जैसाकि श्रीमद्भागवत (१.१३.४७) में कहा गया है वध का यह कार्य प्राकृतिक है। जीवो जीवस्य जीवनम्—“एक पशु दूसरे पशु का भोजन है।” मेंढक को साँप खाता है, साँप को नेवला और नेवले को कोई अन्य जीव खाता है। इस प्रकार भगवान् की इच्छानुसार विनाश का क्रम चलता रहता है। यद्यपि इसमें हमें प्रत्यक्ष रूप से भगवान् का कोई हाथ नहीं दिखता, किन्तु भगवान् की विनाशलीला से अनुभव होता है कि इसमें उनका हाथ है। हम यह देख सकते हैं कि वायु के द्वारा बादल तितर-बितर होते हैं, भले ही हम यह न देख पाएँ कि ऐसा किस प्रकार हो रहा है, क्योंकि वायु को देख पाना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार भले ही हम प्रत्यक्ष रूप से भगवान् को न देखें, किन्तु इतना तो हम देखते ही हैं कि किस प्रकार विनाशलीला उनके वश में है। भगवान् के नियंत्रण में विनाशलीला जोरों से चलती रहती है, किन्तु नास्तिक उसे देख नहीं पाते।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥