श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 66

 
श्लोक
प्रमत्तमुच्चैरिति कृत्यचिन्तया
प्रवृद्धलोभं विषयेषु लालसम् ।
त्वमप्रमत्त: सहसाभिपद्यसे
क्षुल्लेलिहानोऽहिरिवाखुमन्तक: ॥ ६६ ॥
 
शब्दार्थ
प्रमत्तम्—पागल पुरुष; उच्चै:—जोर से; इति—इस प्रकार; कृत्य—किये जाने वाले; चिन्तया—ऐसी इच्छा से; प्रवृद्ध— अत्यधिक अग्रसर; लोभम्—लालच; विषयेषु—भौतिक सुख में; लालसम्—ऐसा चाहते हुए; त्वम्—तुम; अप्रमत्त:—पूर्णतया समाधि में; सहसा—एकाएक; अभिपद्यसे—उन्हें पकड़ लेता है; क्षुत्—भूखा; लेलिहान:—लालची जीभ से; अहि:—साँप; इव—सदृश; आखुम्—चूहे को; अन्तक:—विनष्ट करने वाला, काल ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, इस संसार के सारे प्राणी कुछ-न-कुछ योजना बनाने में पागल हैं तथा यह या वह करते रहने की इच्छा से काम में जुटे रहते हैं। अनियंत्रित लालच के कारण यह सब होता है। जीवात्मा में भौतिक सुख की लालसा सदैव बनी रहती है, किन्तु आप नित्य सतर्क रहते हैं और समय आने पर आप उस पर उसी प्रकार टूट पड़ते हैं जिस प्रकार सर्प चूहे पर झपटता है और आसानी से निगल जाता है।
 
तात्पर्य
 प्रत्येक व्यक्ति लोभी होता है और वह भौतिक सुख के लिए तरह-तरह की योजनाएँ बनाता है। भौतिक सुख की लालसा के कारण प्रत्येक जीवात्मा को प्रमत्त (पागल) कहा गया है।
भगवद्गीता (३.२७) में कहा गया है—

प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

“प्रकृति के तीन गुणों के वशीभूत होकर मोहग्रस्त आत्मा अपने को कर्मों का कर्ता मान बैठता है, जबकि वास्तव में वे प्रकृति द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं।”

हर कार्य प्रकृति के नियमों के अनुसार सम्पन्न होता है और ये नियम श्रीभगवान् के नियंत्रण में रहते हैं। नास्तिक या मूढ़ इसे नहीं जानते। वे अपनी योजनाएँ बनाने में और बड़े-बड़े राष्ट्र अपने साम्राज्य विस्तृत करने में लगे रहते हैं। फिर भी हम जानते हैं कि समय समय पर अनेक राज्य इस तरह बने और नष्ट हो गये। जनता की निदी मूर्खता से अनेक राज-परिवार अस्तित्व में आये, किन्तु कालक्रम में वे सब परिवार तथा राज्य नष्ट हो गये। तब भी मूढ़ नास्तिक लोग भगवान् की श्रेष्ठता स्वीकार नहीं करते। ऐसे मूर्ख लोग अनावश्यक रूप से भगवान् की परम सत्ता को माने बगैर अपने- अपने कार्य गढ़ते रहते हैं। तथाकथित राजनीतिज्ञ अपने-अपने राष्ट्र की समृद्धि बढ़ाने के लिए योजनाएँ बनाने में लगे रहते हैं, किन्तु सच तो यह है कि वे अपने पद को ऊपर उठाने में ही लगे रहते हैं। भौतिक पद की अपनी लालसा के लिए वे जनता के समक्ष अपने को नेता रूप में प्रस्तुत करते हैं और उनसे वोट बटोरते हैं यद्यपि वे पूर्ण रूप से प्रकृति के नियमों की पकड़ में होते हैं। ये आधुनिक सभ्यता के कुछ दोष हैं। ईश्वर-भक्ति तथा भगवान् की श्रेष्ठता को स्वीकार किये बिना जीवात्माएँ अन्तत: अपनी ही योजनाओं से उद्विग्न और भ्रमित हो उठती हैं। आर्थिक विकास की अवैध योजनाओं के फलस्वरूप विश्वभर में वस्तुओं के दाम प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं जिससे निर्धन वर्ग का जीवन दूभर गया है और वे इस का परिणाम भोग रहे हैं। कृष्णचेतना (भक्ति) के अभाव से लोग तथाकथित नेताओं तथा योजना बनाने वालों से ठगे जाते हैं। फलस्वरूप लोगों के कष्ट बढ़ते जाते हैं। प्रकृति के नियमों के अनुसार जो परमेश्वर से अनुमोदित है, इस जगत में कुछ भी स्थायी नहीं हो सकता; अत: अपनी रक्षा के लिए सबों को परमेश्वर की शरण ग्रहण करनी चाहिए। इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता (५.२९) में कहा है—

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥

“मुनिजन मुझे ही समस्त यज्ञों तथा तपों का परम प्रयोजन, समस्त लोकों तथा देवताओं का परमेश्वर तथा समस्त जीवों का उपकारी एवं शुभचिन्तक समझ करके भौतिक कष्टों से शान्ति प्राप्त करते हैं।”

यदि कोई अपनी मन:शान्ति तथा समाज में अमन चैन चाहता है, तो उसे भगवान् को वास्तविक भोक्ता मान लेना चाहिए। भगवान् सारे ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु का स्वामी (अधिष्ठाता) और साथ ही सारे जीवों का परम मित्र भी है। इसे समझकर ही लोग व्यष्टि तथा समष्टि रूप से प्रसन्नता से तथा शान्तिपूर्वक रह सकते हैं।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥