श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 68

 
श्लोक
अथ त्वमसि नो ब्रह्मन् परमात्मन् विपश्चिताम् ।
विश्वं रुद्रभयध्वस्तमकुतश्चिद्भया गति: ॥ ६८ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—अत:; त्वम्—तुम, हे स्वामी; असि—हो; न:—हमारे; ब्रह्मन्—हे परब्रह्म; परम-आत्मन्—हे परमात्मा; विपश्चिताम्— विद्वान मनुष्यों के लिए; विश्वम्—सारा ब्रह्माण्ड; रुद्र-भय—रुद्र से भयभीत; ध्वस्तम्—संहार किया हुआ; अकुतश्चित्-भया— निश्चित रूप से निर्भर, भयशून्य; गति:—गन्तव्य, आश्रय ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवन्, जो वास्तव में विद्वान् मनुष्य हैं, वे सभी आपको परब्रह्म एवं परमात्मा के रूप में जानते हैं। यद्यपि सारा ब्रह्माण्ड भगवान् रुद्र से भयभीत रहता है, क्योंकि वे अन्तत: प्रत्येक वस्तु को नष्ट करने वाले हैं, किन्तु विद्वान् भक्तों के लिए आप निर्भय आश्रय हैं।
 
तात्पर्य
 इस दृश्य जगत की उत्पत्ति, पालन तथा संहार के लिए तीन महाधीश हैं—ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव (महेश्वर)। प्रलय के समय यह भौतिक शरीर नष्ट हो जाता है। विराट शरीर तथा जीव का लघु शरीर दोनों ही चरम अन्त में विनाशशील हैं। किन्तु भक्तों को शरीर-विनाश का कोई भय नहीं रहता, क्योंकि उनका दृढ़ विश्वास होता है कि विनाश के बाद वे अपने घर अर्थात् भगवान् के धाम वापस जायेंगे (त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेतिसोऽर्जुन )।
यदि कोई दृढ़तापूर्वक भक्तियोग का अनुसरण करता है, तो उसे मृत्यु का भय नहीं रह जाता, क्योंकि उसका भगवान् के धाम वापस जाना पूर्वनिश्चित है। अभक्त ही मृत्यु से डरते हैं, क्योंकि उन्हें इसकी कोई गारंटी नहीं होती कि वे कहाँ जाएँगे या अगले जन्म में उन्हें किस प्रकार का शरीर प्राप्त होगा। इस श्लोक का रुद्रभय शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि रुद्र अर्थात् शिवजी ही ‘रुद्रभय’ की बात कर रहे हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि रुद्र भी कई हैं—इनकी संख्या ग्यारह है और ये रुद्र (शिव), जो भगवान् की स्तुति कर रहे हैं, अन्य रुद्रों से भिन्न हैं, यद्यपि ये भी उन्हीं के समान शक्तिमान हैं। निष्कर्ष यह निकला कि एक रुद्र दूसरे रुद्र से भयभीत रहता है, क्योंकि इनमें से प्रत्येक इस दृश्य जगत के संहार में लगा रहता है। किन्तु भक्त की दृष्टि में तो प्रत्येक व्यक्ति रुद्र से डरता है, यहाँ तक कि स्वयं रुद्र भी। भक्त कभी भी रुद्र से नहीं डरता, क्योंकि भगवान् के चरणकमलों की शरण में रहने से वह सदैव सुरक्षित रहता है। जैसाकि श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता (९.३१) में कहा है—कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति—“हे अर्जुन! तुम यह स्पष्ट घोषणा कर सकते हो कि मेरा (भगवान् श्रीकृष्ण का) शुद्ध भक्त किसी भी दशा में विनष्ट नहीं होता।”
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥