श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 69

 
श्लोक
इदं जपत भद्रं वो विशुद्धा नृपनन्दना: ।
स्वधर्ममनुतिष्ठन्तो भगवत्यर्पिताशया: ॥ ६९ ॥
 
शब्दार्थ
इदम्—यह; जपत—जपते हुए; भद्रम्—समस्त कल्याण; व:—तुम सभी; विशुद्धा:—शुद्ध; नृप-नन्दना:—राजा के पुत्र; स्व धर्मम्—अपने-अपने कार्य; अनुतिष्ठन्त:—करते हुए; भगवति—भगवान् को; अर्पित—अर्पित कर; आशया:—समस्त आज्ञाकारिता से युक्त ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजपुत्रो, तुम लोग विशुद्ध हृदय से राजाओं की भाँति अपने-अपने नियत कर्म करते रहो। भगवान् के चरणकमलों पर अपने मन को स्थिर करते हुए इस स्तुति (स्तोत्र) का जप करो। इससे तुम्हारा कल्याण होगा, क्योंकि इससे भगवान् तुम पर अत्यधिक प्रसन्न होंगे।
 
तात्पर्य
 शिवजी द्वारा की गई स्तुति अत्यन्त प्रामाणिक एवं महत्त्वपूर्ण है। अपने कर्म में लगे रहते हुए भी परमेश्वर की स्तुति करने मात्र से मनुष्य पूर्ण बन सकता है। जीवन का असली उद्देश्य तो भगवद्भक्त बनना है। इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए कि उसकी सामाजिक स्थिति क्या है। चाहे ब्राह्मण हो या क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा अमरीकी, अंग्रेज, भारतीय, इस संसार में कहीं भी रहकर श्रीभगवान् की स्तुति करके भक्ति की जा सकती है। हरे कृष्ण महामंत्र भी स्तुति ही है, क्योंकि स्तुति में भगवान् को नाम से सम्बोधित किया जाता है और भगवान् से विनय की जाती है कि वे सौभाग्य का वरदान देकर अपनी भक्ति में लगायें। हरे कृष्ण महामंत्र भी कहता है, “हे भगवान् कृष्ण, हे भगवान् राम, हे भगवान् की शक्ति हरे! कृपया मुझे अपनी सेवा में लगाइये।” भले ही कोई निम्न वर्ग का क्यों न हो, वह हर अवस्था में भक्ति कर सकता है जैसाकि भागवत (१.२.६) में कहा गया है—
अहैतुक्यप्रतिहता:—“भक्ति को किसी भी भौतिक दशा में रोका नहीं जा सकता।” भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने भी यही विधि बताई है।

ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्ताम्।

स्थाने स्थिता: श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि र्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम् ॥

(भागवत १०.१४.३) मनुष्य अपनी स्थिति में रहते हुए अथवा अपना कर्म करते हुए सिद्ध पुरुषों से भगवान् के सन्देश को सुन सकता है। कृष्णभावनामृत-आन्दोलन इसी सिद्धान्त पर आधारित है और हम लोग संसार भर में श्रीकृष्ण के सन्देश को सुनने का अवसर प्रदान करने के लिए विभिन्न केन्द्र खोल रहे हैं जिससे लोग अपने घर को अर्थात् भगवान् के धाम वापस जा सकें।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥