श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 7

 
श्लोक
तत्रापि हंसं पुरुषं परमात्मानमात्मद‍ृक् ।
यजंस्तल्लोकतामाप कुशलेन समाधिना ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र अपि—अपनी व्यस्तता के बावजूद; हंसम्—जो अपने सम्बन्धियों के कष्ट को दूर करता है; पुरुषम्—परम पुरुष को; परम- आत्मानम्—परम प्रिय परमात्मा; आत्म-दृक्—जिसने आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर लिया है; यजन्—पूजा द्वारा; तत्- लोकताम्—उसी लोक को; आप—प्राप्त किया; कुशलेन—सरलतापूर्वक; समाधिना—समाधि में लीन रह कर ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि महाराज अन्तर्धान यज्ञ करने में व्यस्त रहते थे, किन्तु स्वरूपसिद्ध व्यक्ति होने के नाते वे भक्तों के समस्त भय को दूर करने वाले भगवान् की भक्ति भी करते रहे। इस प्रकार भगवान् की पूजा करते हुए महाराज अन्तर्धान समाधि में लीन रह कर सरलतापूर्वक भगवान् के ही लोक को प्राप्त हुए।
 
तात्पर्य
 चूँकि सामान्यत: यज्ञ सकाम कर्मियों द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं, अत: यहाँ विशेष उल्लेख है (तत्रापि ) कि यद्यपि महाराज अन्तर्धान बाह्य रूप से यज्ञ करते थे, किन्तु उनकी वास्तविक वृत्ति तो श्रवण तथा कीर्तन द्वारा भक्ति करनी थी। दूसरे शब्दों में, वे सामान्य यज्ञों को संकीर्तन-यज्ञ की विधि से सम्पन्न करते थे जिसकी संस्तुति यहाँ पर की गई है (भागवत ७.५.२३) श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

भक्ति को कीर्तन-यज्ञ कहते हैं। संकीर्तन-यज्ञ के द्वारा मनुष्य सरलता से उस लोक को जाता है जहाँ परमेश्वर का वास है। पाँच प्रकार के मोक्षों में से जिस लोक में भगवान् रहते हैं उसे प्राप्त करके भगवान् के साथ रहने को सालोक्य मोक्ष कहते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥