श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 70

 
श्लोक
तमेवात्मानमात्मस्थं सर्वभूतेष्ववस्थितम् ।
पूजयध्वं गृणन्तश्च ध्यायन्तश्चासकृद्धरिम् ॥ ७० ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उस; एव—निश्चय ही; आत्मानम्—परमात्मा को; आत्म-स्थम्—अपने हृदय में; सर्व—समस्त; भूतेषु—प्रत्येक जीव में स्थित; अवस्थितम्—स्थित; पूजयध्वम्—उनकी पूजा करो; गृणन्त: च—सदैव कीर्तन करते हुए; ध्यायन्त: च—ध्यान करते हुए; असकृत्—निरन्तर; हरिम्—श्रीभगवान् का ।.
 
अनुवाद
 
 अत: हे राजकुमारो, भगवान् सबके हृदयों में स्थित हैं। वे तुम लोगों के भी हृदयों में हैं, अत: भगवान् की महिमा का जप करो और निरन्तर उसी का ध्यान करो।
 
तात्पर्य
 असकृत् शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसका अर्थ ‘कुछ पलों के लिए’ नहीं, अपितु “अनवरत रूप से” है। यही आदेश भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने अपने शिक्षाष्टक में दिया है। कीर्तनीय: सदा हरि:—“भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन चौबीसों घण्टे करना चाहिए।” अत: इस कृष्णभावनामृत-आन्दोलन में भक्तों को नित्यप्रति सोलह बार माला का जप करने के लिए कहा जाता है। वास्तव में ठाकुर हरिदास की भाँति भगवन्नाम का चौबीसों घण्टे जप ही करना चाहिए। वे दिन में ३ लाख बार नाम-जप करते थे। दरअसल इसके सिवाय उनके पास कोई दूसरा काम ही न था। रघुनाथ दास गोस्वामी जैसे अन्य कुछ गोस्वामी भी नियमपूर्वक जप करते तथा नमस्कार करते थे। जैसाकि षड्-गोस्वामी-अष्टक में श्रीनिवासाचार्य ने स्तुति की है—सङ्ख्यापूर्वक नाम गान-नतिभि: कालावसानीकृतौ। संख्यापूर्वक शब्द का अर्थ है “गिनती को स्थिर बनाये रखते हुए।” रघुनाथ दास गोस्वामी न केवल भगवन्नाम का जप करते थे, वरन् उसी त्वरा से वे नमस्कार भी करते थे।
चूँकि ये राजकुमार भगवान् की पूजा के लिए पहले से तपस्या करने जा रहे थे, अत: शिवजी ने उन्हें उपदेश दिया कि वे भगवान् का निरन्तर जप तथा ध्यान करते रहें। यह महत्त्वपूर्ण बात है कि शिवजी ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की वैसी ही स्तुति की जैसी कि उनके पिता ब्रह्मा ने उन्हें बतलाई थी। इस प्रकार से वे परम्परा-पद्धति के अनुसार राजकुमारों को उपदेश दे रहे थे। मनुष्य को चाहिए कि वह न केवल गुरु से प्राप्त आदेशों के अनुसार आचरण करे वरन् अपने शिष्यों में भी इस ज्ञान का वितरण करता चले।

आत्मानमात्मस्थं सर्व भूतेष्ववस्थितम् शब्द भी महत्त्वपूर्ण हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सारे जीवों के उद्गम हैं। चूँकि सारे जीव उनके भिन्नांश हैं, अत: वे सबके पिता हैं। प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित होने के कारण परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर खोजा जा सकता है। इस श्लोक में भगवान् की पूजा-विधि को अत्यन्त सरल एवं पूर्ण बताया गया है, क्योंकि कहीं भी और किसी भी अवस्था में होते हुए भगवान् के नाम का केवल जप करना चाहिए। कीर्तन तथा श्रवण से स्वत: ही मनुष्य ध्यान में लग जाता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥