श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 71

 
श्लोक
योगादेशमुपासाद्य धारयन्तो मुनिव्रता: ।
समाहितधिय: सर्व एतदभ्यसताद‍ृता: ॥ ७१ ॥
 
शब्दार्थ
योग-आदेशम्—भक्तियोग का यह आदेश; उपासाद्य—निरन्तर पढ़ते हुए; धारयन्त:—तथा आत्मसात करते हुए; मुनि-व्रता:— मुनियों का व्रत, मौन व्रत लो; समाहित—मन में सदैव स्थिर, एकाग्रभाव से; धिय:—बुद्धि से; सर्वे—तुम सब; एतत्—यह; अभ्यसत—अभ्यास करो; आदृता:—अत्यन्त आदरपूर्वक ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजपुत्रो, मैंने स्तुति के रूप में तुम्हें पवित्र नाम-जप की योगपद्धति बतला दी है। तुम सब इस स्तोत्र को अपने मनों में धारण करते हुए इस पर दृढ़ रहने का व्रत लो जिससे तुम महान् मुनि बन सको। तुम्हें चाहिए कि मुनि की भाँति मौन धारण करके तथा ध्यानपूर्वक एवं आदर सहित इसका पालन करो।
 
तात्पर्य
 हठयोग पद्धति में मनुष्य को ध्यान, धारणा, आसन इत्यादि शारीरिक आसन करने होते हैं। उसे एक स्थान पर विशेष आसन लगा करके अपनी नाक के अग्रभाग पर अपनी दृष्टि केन्द्रित करनी होती है। हठयोग पद्धति में इतने सारे विधि-विधान हैं कि इस युग में उन्हें कर पाना कठिन है। किन्तु भक्तियोग की वैकल्पिक पद्धति न केवल इस युग के लिए वरन् अन्य युगों के लिए भी अत्यन्त सहज है, क्योंकि इस योग-पद्धति का उपदेश शिवजी द्वारा महाराज प्राचीन बर्हिषत् के पुत्रों को दिया गया था। भक्तियोग-पद्धति कोई नवीन नहीं है, क्योंकि पाँच हजार वर्ष पूर्व भगवान् कृष्ण ने भक्तियोग को सर्वोच्च योग के रूप में बतलाया था। भगवद्गीता (६.४७) में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।

श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मत: ॥

“योगियों में से जो अत्यन्त श्रद्धापूर्वक प्रेमाभक्ति में मेरी पूजा करता है, वह योग में मुझसे भली भाँति संयुक्त रहता है और सबों में सर्वोच्च है।”

सर्वोच्च योगी वह है, जो अपने भीतर श्रीकृष्ण का निरन्तर ध्यान करता है और भगवान् की महिमा का कीर्तन करता रहता है। दूसरे शब्दों में, इस प्रकार का भक्तियोग अनन्त काल से चला आ रहा है और अब इस कृष्णभावनामृत-आन्दोलन में चालू है।

इस प्रसंग में मुनि-व्रत: शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि जो आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करना चाहते हैं, उन्हें मौन रहना चाहिए। मौन का अर्थ है केवल कृष्ण-कथा की बात करना या कृष्ण का गुणानुवाद। यह मौन महाराज अम्बरीष जैसा है—स वै मन: कृष्ण पदारविन्दयोर्वचांसि वैकुण्ठ- गुणानुवर्णने—“राजा अम्बरीष ने सदैव भगवान् के चरणकमल में ही अपने मन को स्थिर रखा और और उन्हीं का गुणानुवाद किया” (भागवत ९.४.१९)। हमें चाहिए कि हम इस जीवन के अवसर को महान् संत बनने में लगाएं और इसका उपयोग अवांछित व्यक्तियों से व्यर्थ बातें करने में न करें। हमें या तो कृष्ण का गुणानुवाद करना चाहिए या हरे कृष्ण का कीर्तन करना चाहिए। यह मुनिव्रत कहलाता है। बुद्धि को अत्यन्त प्रखर होना चाहिए (समाहित-धिय ) तथा कृष्णभक्ति की दिशा में कार्य करना चाहिए। एतदभ्यसतादृता: शब्द बताते हैं कि यदि इन आदेशों को गुरु से आदरपूर्वक प्राप्त किया जाये और विधिपूर्वक इनका अभ्यास किया जाये तो यह भक्तियोग अत्यन्त सरल लगेगा।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥