श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 72

 
श्लोक
इदमाह पुरास्माकं भगवान् विश्वसृक्पति: ।
भृग्वादीनामात्मजानां सिसृक्षु: संसिसृक्षताम् ॥ ७२ ॥
 
शब्दार्थ
इदम्—यह; आह—कहा; पुरा—पहले; अस्माकम्—हमसे; भगवान्—स्वामी; विश्व-सृक्—ब्रह्माण्ड के स्रष्टा; पति:—स्वामी; भृगु-आदीनाम्—भृगु इत्यादि ऋषियों का; आत्मजानाम्—उनके पुत्रों का; सिसृक्षु:—उत्पत्तिके इच्छुक; संसिसृक्षताम्—सृष्टि के लिए उत्तरदायी ।.
 
अनुवाद
 
 सर्वप्रथम समस्त प्रजापतियों के स्वामी ब्रह्मा ने हमें यह स्तुति सुनायी थी। भृगु आदि प्रजापतियों को भी इसी स्तोत्र की शिक्षा दी गई थी, क्योंकि वे सन्तानोत्पत्ति करना चाह रहे थे।
 
तात्पर्य
 भगवान् विष्णु ने ब्रह्मा को उत्पन्न किया; फिर ब्रह्मा ने शिव तथा भृगुमुनि इत्यादि अन्य ऋषियों—मरीचि, आत्रेय, वसिष्ठ तथा अन्य—को उत्पन्न किया। इन सब ऋषियों को सन्तान उत्पन्न करने का भार सौंपा गया था। चूँकि प्रारम्भ में जीवों की संख्या अधिक न थी, अत: विष्णु ने सन्तान उत्पन्न करने का कार्य ब्रह्मा को सौंपा और ब्रह्मा ने सृष्टि बनाये रखने के लिए हजारों देवता तथा ऋषि उत्पन्न किये। साथ ही ब्रह्मा ने अपने पुत्रों तथा शिष्यों को यह स्तुति, जिसे शिवजी सुना रहे हैं, सुनाकर सचेत किया कि भौतिक सृष्टि का अर्थ है भौतिक व्यस्तता, किन्तु इस व्यस्तता का निराकरण भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को सदैव स्मरण करते हुए किया जा सकता है, जैसाकि शिवजी द्वारा की गई इस स्तुति में बताया गया है। इस प्रकार से हम भगवान् के निरन्तर सम्पर्क में रह सकते हैं। इस तरह सृष्टि में व्यस्तता के बावजूद हम कृष्ण-भक्ति के पथ से विचलित नहीं होंगे। कृष्णभावनामृत- आन्दोलन विशेष रूप से इसी प्रयोजन से चलाया गया है। इस जगत में प्रत्येक व्यक्ति वर्णाश्रम धर्म में बताये गये वृत्तिपरक कर्म में लगा रहता है। यह ठीक है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने काम में लगे हुए हैं, किन्तु यदि वे अपने पहले कर्तव्य—भगवान् से निरन्तर सम्पर्क रखने—को स्मरण रखते हैं, तो सब कुछ सफल हो जाएगा। यदि वे केवल वर्णाश्रम धर्म का ही पालन करने में लगे रहते हैं और भगवान् से अपने शाश्वत सम्बन्ध का स्मरण नहीं करते तो उनका सारा व्यापार तथा सारा वर्णाश्रम धर्म मात्र समय का अपव्यय होगा। श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध (१.२.८) में इसकी पुष्टि की गई है—
धर्म: स्वनुष्ठित: पुंसां विश्वक्सेनकथासु य:।

नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥

निष्कर्ष यह है कि अपने-अपने वृत्तिपरक कर्म को निबाहते हुए कृष्णभक्ति के कार्य में बाधा नहीं पहुँचने देना चाहिए। मात्र श्रवणं कीर्तनं की भक्ति करनी चाहिए। अपने कर्म (धर्म) को नहीं छोडऩा चाहिए। जैसाकि भगवद्गीता (१८.४६) में कहा गया है—

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव: ॥

“मनुष्य अपना कर्म करता हुआ जीवों के उद्गम तथा सर्वव्यापी भगवान् की पूजा करके सिद्धि प्राप्त कर सकता है।”

इस प्रकार मनुष्य अपना कर्म करता रह सकता है, किन्तु यहाँ पर शिवजी ने जो स्तुति बताई है यदि उससे मनुष्य भगवान् की पूजा करता है, तो उसका जीवन पूर्णरूपेण सफल हो जाता है। स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम् (भागवत १.२.१३)। हमें अपना कर्म तो करना ही चाहिए, किन्तु यदि हम अपने कर्मों से भगवान् को प्रसन्न कर सकें तो हमारा जीवन सफल हो जाये।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥