श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 73

 
श्लोक
ते वयं नोदिता: सर्वे प्रजासर्गे प्रजेश्वरा: ।
अनेन ध्वस्ततमस: सिसृक्ष्मो विविधा: प्रजा: ॥ ७३ ॥
 
शब्दार्थ
ते—उसके द्वारा; वयम्—हम सब; नोदिता:—आज्ञापित; सर्वे—सभी; प्रजा-सर्गे—प्रजा उत्पन्न करते समय; प्रजा-ईश्वरा:— समस्त जीवों के नियन्ता; अनेन—इसके द्वारा; ध्वस्त-तमस:—सभी प्रकार के अज्ञान से मुक्त होकर; सिसृक्ष्म:—हमने उत्पन्न किया; विविधा:—अनेक प्रकार के; प्रजा:—जीव ।.
 
अनुवाद
 
 जब ब्रह्मा द्वारा हम सब प्रजापतियों को प्रजा उत्पन्न करने का आदेश हुआ तो हमने भगवान् की प्रशंसा में इस स्तोत्र का जप किया जिससे हम समस्त अविद्या से पूरी तरह से मुक्त हो गये। इस तरह हम विविध प्रकार के जीवों की उत्पत्ति कर पाये।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक से यह समझ में आता है कि सृष्टि के प्रारम्भ में एकसाथ अनेक प्रकार के जीव उत्पन्न हुए। यहाँ पर अर्थहीन डार्विन का विकासवाद लागू नहीं होता। ऐसा नहीं है कि लाखों वर्ष पूर्व बुद्धिमान मनुष्य का अस्तित्व न था। उल्टा यह पता चलता है कि सबसे बुद्धिमान प्राणी ब्रह्माजी सबसे पहले उत्पन्न हुए। तब ब्रह्माजी ने मरीचि, भृगु, आत्रेय, वसिष्ठ तथा शिव जैसे साधु पुरुषों को उत्पन्न किया। तब उन्होंने कर्मों के अनुसार विभिन्न प्रकार के जीव उत्पन्न किए। श्रीमद्भागवत में कपिल देव ने अपनी माता को बताया है कि जीवात्मा को अपने कर्म के अनुसार विशेष शरीर प्राप्त होता है और उच्चतर अधिकारी ही इस शरीर के विषय में निर्णय करते हैं। ये उच्चतर अधिकारी भगवान् द्वारा नियुक्त होते हैं और इनके नाम हैं—ब्रह्मा, मनु तथा अन्य प्रजापति। इस प्रकार सृष्टि के प्रारम्भ से ही यह देखा जा सकता है कि सब से पहला जीव सबसे अधिक बुद्धिमान था। ऐसा नहीं है कि तथाकथित आधुनिक बुद्धि विकास की क्रमिक प्रक्रिया से विकसित हुई हो। जैसाकि ब्रह्म-वैवर्त पुराण में कहा गया है, क्रमिक विकास होता तो है, किन्तु शरीर का विकास नहीं होता। सारे शारिरिक रूप पहले से रहते हैं। केवल शरीर के भीतर का आत्म स्फुलिंग ही प्रकृति के नियमों द्वारा श्रेष्ठ अधिकारी के अधीक्षण में प्रगति करता है। इस श्लोक से यह समझ में आता है कि सृष्टि के प्रारम्भ से विभिन्न प्रकार के जीव विद्यमान थे। ऐसा नहीं है कि उनमें से कुछ विलुप्त हो गये हैं। सब कुछ यहाँ पर हैं, केवल ज्ञान के अभाव के कारण हम वस्तुओं को उनके वास्तविक रूप में नहीं देख पा रहे हैं।
इस श्लोक का ध्वस्त-तमस: शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि अज्ञान से मुक्त हुए बिना विभिन्न प्रकार के जीवों की उत्पत्ति को नियंत्रित नहीं किया जा सकता। जैसाकि श्रीमद्भागवत (३.३१.१) में कहा गया है—दैवनेत्रेण—श्रेष्ठ अधिकारियों के नियंत्रण में ही शरीर मिलता है। यदि ये श्रेष्ठ अधिकारी सभी प्रकार की अपूर्णताओं से मुक्त नहीं होंगे तो वे जीवों के विकास को किस प्रकार नियंत्रित कर सकेंगे? वैदिक अनुदेशों के माननेवाले डार्विन के विकासवाद को स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि यह अधूरे ज्ञान के कारण विकसित है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥