श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 74

 
श्लोक
अथेदं नित्यदा युक्तो जपन्नवहित: पुमान् ।
अचिराच्छ्रेय आप्नोति वासुदेवपरायण: ॥ ७४ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—इस प्रकार; इदम्—यह; नित्यदा—नियमित रूप से; युक्त:—मनोयोग से; जपन्—मन के भीतर जपने से; अवहित:— पूर्ण रूप से सतर्क; पुमान्—मनुष्य; अचिरात्—अविलम्ब; श्रेय:—कल्याण; आप्नोति—प्राप्त करता है; वासुदेव-परायण:— भगवान् कृष्ण का भक्त ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् कृष्ण के भक्त जिसका मन सदैव उन्हीं में लीन रहता है और जो अत्यन्त ध्यान तथा आदरपूर्वक इस स्तोत्र का जप करता है शीघ्र ही जीवन की परम सिद्धि प्राप्त होगी।
 
तात्पर्य
 सिद्धि का अर्थ है भगवान् कृष्ण का भक्त बनना। श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध (१.२.२८) में कहा गया है—वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखा:। जीवन का चरम लक्ष्य वासुदेव या श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्ण का कोई भी भक्त केवल स्तुति करने से समस्त सिद्धि, भौतिक लाभ तथा मुक्ति प्राप्त कर सकता है। बड़े-बड़े ऋषियों तथा महापुरुषों ने, ब्रह्मा तथा शिव ने, भगवान् कृष्ण की अनेक प्रकार से स्तुतियाँ की हैं। भगवान् कृष्ण शिवविरिञ्चिनुतम् कहलाते हैं (भागवत ११.५.३३)। शिव अर्थात्, भगवान् शिव तथा विरिञ्चि अर्थात् ब्रह्मा। ये दोनों देवता भगवान् वासुदेव कृष्ण की स्तुति करते रहते हैं। यदि हम इन महापुरुषों के पदचिह्नों पर चलें और भगवान् कृष्ण के भक्त बन सकें तो हमारा जीवन सार्थक हो जाये। दुर्भाग्यवश लोग इस रहस्य को नहीं जानते। न ते विदु: स्वार्थगतिं हि विष्णुम्—“वे नहीं जानते कि जीवन का वास्तविक प्रयोजन तथा परम सिद्धि भगवान् विष्णु (कृष्ण) की पूजा है (भागवत ७.५.३१)। माया से समझौता करके प्रसन्न रहना असम्भव है। श्रीकृष्ण का भक्त बने बिना मनुष्य केवल दिग्भ्रमित तथा कुंठित बन सकता है। जीवों को इस विपदा से बचाने के लिए ही भगवद्गीता (७.१९) में भगवान् कृष्ण ने संकेत किया है—
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।

वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: ॥

“अनेक जन्म-जन्मांतरों के बाद ज्ञानी मनुष्य भली भाँति यह जानते हुए कि वासुदेव रूप में मैं ही सब कुछ हूँ, मेरी शरण में आ जाता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता है।” वासुदेव के भक्त बनकर हम जो चाहे वही वर प्राप्त कर सकते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥