श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 75

 
श्लोक
श्रेयसामिह सर्वेषां ज्ञानं नि:श्रेयसं परम् ।
सुखं तरति दुष्पारं ज्ञाननौर्व्यसनार्णवम् ॥ ७५ ॥
 
शब्दार्थ
श्रेयसाम्—समस्त उपलब्धियों का; इह—इस संसार में; सर्वेषाम्—प्रत्येक पुरुष का; ज्ञानम्—ज्ञान; नि:श्रेयसम्—परम लाभ; परम्—दिव्य; सुखम्—सुख; तरति—लाँघ जाता है; दुष्पारम्—दुस्तर; ज्ञान—ज्ञान रूपी; नौ:—नाव; व्यसन—खतरा; अर्णवम्—समुद्र ।.
 
अनुवाद
 
 इस संसार में उपलब्धि के अनेक प्रकार हैं, किन्तु इन सबों में ज्ञान की उपलब्धि सर्वोपरि मानी जाती है, क्योंकि ज्ञान की नौका में आरूढ़ होकर ही अज्ञान के सागर को पार किया जा सकता है। अन्यथा यह सागर दुस्तर है।
 
तात्पर्य
 वास्तव में इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अज्ञान के कारण कष्ट उठा रहा है। प्रतिदिन यह देखने में आता है कि ज्ञानहीन मनुष्य किसी तरह का आपराधिक कृत्य कर बैठता है और बाद में पकड़ा जाता है और दण्डित होता है। जब कि उसे अपने इस पापकर्म का बोध नहीं रहा होता है। ऐसा अज्ञान संसार-भर में पाया जाता है। लोग यह समझ ही नहीं पाते कि अवैध कामी आदत से वे अपने जीवन को संकट में डाल रहे हैं, अपने स्वाद के लिए पशुओं को मारते हैं और मद्यपान तथा द्यूतक्रीड़ा में मस्त रहते हैं। यह अत्यन्त शोचनीय है कि संसार के नेता इन पापकर्मों के प्रभावों को नहीं जानते। बजाय इसके वे सारी घटनाओं को सहज भाव से लेते हुए अज्ञान सागर को और चौड़ा बनाने में सफल होते जाते हैं।
ऐसे अज्ञान के विपरीत इस भौतिक संसार में पूर्णज्ञान महानतम उपलब्धि है। व्यावहारिक जीवन में हम देख सकते हैं कि ज्ञानवान् व्यक्ति जीवन के अनेक खतरनाक उतार चड़ावों से बच जाता है। जैसाकि भगवद्गीता (७.१९) में कहा गया है—बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते—“जब मनुष्य वास्तव में ज्ञानवान बन जाता है, तो वह परमात्मा की शरण में जाता है।” वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:—“ऐसा महापुरुष विरले ही पाया जाता है।”

यह कृष्णभावनामृत-आन्दोलन उन तथाकथित नेताओं की आँखें खोलने के लिए कृत्यसंकल्प है, जो अज्ञान से भरे हुए हैं और इस प्रकार उन्हें जीवन के अनेक उतार-चड़ावों तथा घातक परिस्थितियों से बचाता है। सबसे बड़ा खतरा है मनुष्य से निम्नतर योनि को प्राप्त होना। इस मनुष्य देह को बड़ी ही कठिनाई से इसीलिए प्राप्त किया गया जिससे इसका लाभ उठाकर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित किया जा सके। शिवजी उपदेश देते हैं कि जो उनके स्तोत्र का लाभ उठायेंगे वे शीघ्र ही भगवान् के भक्त बनेंगे और अज्ञान सागर को पार करने तथा जीवन को पूर्ण बनाने में समर्थ हो सकेंगे।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥