श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 76

 
श्लोक
य इमं श्रद्धया युक्तो मद्गीतं भगवत्स्तवम् ।
अधीयानो दुराराध्यं हरिमाराधयत्यसौ ॥ ७६ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो कोई; इमम्—यह; श्रद्धया—श्रद्धापूर्वक; युक्त:—अनुरक्तिपूर्वक; मत्-गीतम्—मेरे द्वारा रचित गीत या मेरे द्वारा गाया गीत; भगवत्-स्तवम्—भगवान् की प्रार्थना; अधीयान:—नियमित पाठ द्वारा; दुराराध्यम्—पूजा करना अत्यन्त कठिन; हरिम्— भगवान् को; आराधयति—किन्तु पूजा कर सकता है; असौ—ऐसा मनुष्य ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि भगवान् की भक्ति करना एवं उनकी पूजा करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु यदि कोई मेरे द्वारा रचित एवं गाये गये इस स्तोत्र का केवल पाठ करता है, तो वह सरलतापूर्वक भगवान् की कृपा प्राप्त कर सकता है।
 
तात्पर्य
 यह विशेष तौर पर महत्त्वपूर्ण बात है कि शिवजी भगवान् वासुदेव के शुद्ध भक्त हैं। वैष्णवानां यथा शम्भु:—“समस्त वैष्णवों में शिवजी सर्वोच्च हैं।” फलत: शिवजी का एक वैष्णव शिष्य परम्परा का सम्प्रदाय चला आया है, जिसे रुद्र-सम्प्रदाय कहते हैं। इस समय जो वैष्णवों का विष्णुस्वामी सम्प्रदाय है, वह रुद्र या शिव से सम्बन्धित है। भगवान् कृष्ण या वासुदेव का भक्त होना अत्यन्त कठिन है। इसी लिए दुराराध्यम् शब्द विशेष रूप से प्रयुक्त हुआ है। देवताओं की पूजा उतनी कठिन नहीं है, किन्तु भगवान् कृष्ण या वासुदेव का भक्त बनना इतना आसान नहीं है। यदि कोई महापुरुषों के आदर्शों
तथा उनके पदचिह्नों पर चले तो वह सरलता से भगवान् वासुदेव का भक्त बन सकता है, जैसाकि शिवजी ने उपदेश दिया है। प्रह्लाद महाराज द्वारा भी इसकी पुष्टि हुई है। भक्ति का अभ्यास मनोधर्मियों के द्वारा सम्भव नहीं। भक्ति एक विशेष उपलब्धि है, जिसे वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, जिसने शुद्ध भक्त की शरण ग्रहण की है। जैसाकि प्रह्लाद महाराज ने पुष्टि की है—महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत्—“जब तक सभी प्रकार के भौतिक दोषों से मुक्त शुद्ध भक्त के चरणकमलों की धूल को धारण नहीं की जाती, तब तक भगवान् की भक्ति में प्रविष्ट नहीं हुआ जा सकता।” (भागवत ७.५.३२)।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥