श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 24: शिवजी द्वारा की गई स्तुति का गान  »  श्लोक 77

 
श्लोक
विन्दते पुरुषोऽमुष्माद्यद्यदिच्छत्यसत्वरम् ।
मद्गीतगीतात्सुप्रीताच्छ्रेयसामेकवल्लभात् ॥ ७७ ॥
 
शब्दार्थ
विन्दते—प्राप्त करता है; पुरुष:—भक्त; अमुष्मात्—भगवान् से; यत् यत्—जो जो; इच्छति—कामना करता है; असत्वरम्— स्थिर होकर; मत्-गीत—मेरे द्वारा गाया हुआ; गीतात्—गीत से; सु-प्रीतात्—भगवान् से, जो अत्यन्त प्रसन्न होते हैं; श्रेयसाम्— समस्त आशीर्वादों (वर) में से; एक—एक; वल्लभात्—प्रियतम से ।.
 
अनुवाद
 
 समस्त शुभ आशीर्वादों में से सर्वप्रिय वस्तु भगवान् हैं। जो मनुष्य मेरे द्वारा गाये गये इस गीत को गाता है, वह भगवान् को प्रसन्न कर सकता है। ऐसा भक्त भगवान् की भक्ति में स्थिर होकर परमेश्वर से मनवाञ्छित फल प्राप्त कर सकता है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (६.२२) में कहा गया है—यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:—यदि किसी को भगवान् की कृपा प्राप्त हो जाये तो उसमें किसी प्रकार की आकांक्षा या इच्छा शेष नहीं रहती। जब ध्रुव महाराज तप के द्वारा पूर्ण बन गये और जब उन्होंने भगवान् का साक्षात् दर्शन प्राप्त कर लिया तो उनसे मनवांछित वर माँगने को कहा गया, किन्तु उन्होंने उत्तर दिया कि मुझे कुछ भी नहीं चाहिए, क्योंकि मैं भगवान् के दर्शन प्राप्त करने से ही सन्तुष्ट हूँ। भगवान् की सेवा के अतिरिक्त हम जो कुछ भी माँगते हैं वह माया के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा
है—जीवेर ‘स्वरूप’ हय—कृष्णेर ‘नित्यदास’ (चैतन्य-चरितामृत, मध्य २०.१०८)। प्रत्येक जीवात्मा भगवान् का शाश्वत दास है, अत: जब कोई भगवान् की भक्ति में लग जाता है, तो उसे जीवन की परमसिद्धि प्राप्त हो जाती है। आज्ञाकारी दास अपने स्वामी के अनुग्रह से किसी भी इच्छा की पूर्ति कर सकता है और जो भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में अपने को लगा लेता है, उसे तो और कुछ भी नहीं चाहिए। उसकी सारी इच्छाओं की पूर्ति भगवान् की निरन्तर सेवा करने में ही हो जाती है। शिवजी हमें बताते हैं कि यदि कोई भी भक्त उनके द्वारा सुनाई गई स्तुति का जप करता है, तो वह सफल हो सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥