श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 4

 
श्लोक
श्रेयस्त्वं कतमद्राजन् कर्मणात्मन ईहसे ।
दु:खहानि: सुखावाप्ति: श्रेयस्तन्नेह चेष्यते ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
श्रेय:—चरम अशीर्वाद, वर; त्वम्—तुम; कतमत्—वह क्या है?; राजन्—हे राजा; कर्मणा—सकाम कार्म द्वारा; आत्मन:— आत्मा का; ईहसे—चाहते हो; दु:ख-हानि:—समस्त कष्टों का लोष; सुख-अवाप्ति:—समस्त सुखों की प्राप्ति; श्रेय:— आशीर्वाद; तत्—वह; न—कभी नहीं; इह—इस प्रसंग में; च—तथा; इष्यते—प्राप्य है ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने राजा प्राचीनबर्हिषत् से पूछा: हे राजन्, तुम इन सकाम कर्मों के द्वारा कौन सी इच्छा पूरी करना चाहते हो? जीवन का मुख्य उद्देश्य तो समस्त कष्टों से छुटकारा पाना तथा सुख भोगना है, किन्तु इन दोनों को सकाम कर्म द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता।
 
तात्पर्य
 इस संसार में मोह ने वास्तविक बुद्धि को अच्छादित कर रखा है। रजोगुणी व्यक्ति किञ्चित् लाभ के लिए कठोर श्रम करने को उद्यत रहता है, किन्तु उसे इसका ज्ञान भी नहीं रहता कि काल उसे सदा के लिए कुछ भी भोगने नहीं देगा। श्रम की तुलना में मनुष्य को जो लाभ मिलता है, वह उपयोगी नहीं होता और यदि उपयोगी हुआ भी, तो निरापद नहीं होता। यदि कोई मनुष्य पैदायती धनी नहीं है और वह घर, मोटर तथा अन्य भौतिक वस्तुएँ खरीदना चाहता है, जिसके लिए उसे वर्षों अहर्निश श्रम करना पड़ता है। इस प्रकार बिना कुछ कष्ट उठाये सुख की प्राप्ति नहीं होती।
वास्तव में इस संसार के भीतर विशुद्ध सुख तो मिल ही नहीं सकता। यदि हम कोई सुखोपभोग करना चाहते हैं, तो बदले में कोई दूसरा कष्ट उठाना होगा। कुल मिलाकर दुख इस संसार की प्रकृति बन चुका है और हम जो भी सुख भोगना चाहते हैं वह मात्र छलावा (मोह) है। अन्तत: हम सबों को जन्म, जरा, रोग तथा मृत्यु के कष्ट सहने पड़ते हैं। भले ही हम बढिय़ा से बढिय़ा दवाएँ खोज निकालें, किन्तु रोग या मृत्यु द्वारा उत्पन्न कष्टों को रोक पाना असम्भव है। वस्तुत: दवा, रोग अथवा मृत्यु के लिए निराकरण नहीं है। कहने का तात्पर्य यह कि इस संसार में कहीं भी सुख नहीं है, किन्तु मोहग्रस्त व्यक्ति तथाकथित सुख के लिए कठिन श्रम करता है। निस्सन्देह कठिन श्रम करने को ही सुख मान लिया जाता है। यही मोह है।

इसीलिए नारद मुनि ने राजा प्राचीनबर्हिषत् से पूछा कि वे इतने व्ययसाध्य यज्ञों को करके क्या पाना चाह रहे हैं। यदि कोई स्वर्गलोक पा भी ले तो उसे जन्म, जरा, रोग तथा मृत्यु से छुटकारा नहीं मिल सकता। चाहे तो कोई यह तर्क कर सकता है कि भक्तों को भी भक्ति के लिए कठिन तपस्या करते समय अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। निस्सन्देह, नवदीक्षितों के लिए भक्ति-साधना अत्यन्त कष्टप्रद लग सकती है, किन्तु उन्हें यह आशा तो बनी रहती है कि अन्तत: उनके सारे कष्ट दूर होंगे और उन्हें सुख की चरम अवस्था प्राप्त हो सकेगी। सामान्य कर्मियों को ऐसी आशा नहीं रहती, क्योंकि उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति हो भी जाय तो जन्म, जरा, रोग तथा मृत्यु से मुक्ति का कोई आश्वासन प्राप्त नहीं रहता। यहाँ तक कि सर्वोच्च लोक (ब्रह्मलोक) में स्थित ब्रह्मा को भी मरना पड़ता है। भले ही ब्रह्मा का जन्म तथा मृत्यु सामान्य व्यक्ति के जन्म तथा मृत्यु से भिन्न हो, किन्तु इस संसार में वे भी जन्म, जरा, रोग तथा मृत्यु के दुख से बच नहीं पाते। अत: यदि कोई सचमुच इन कष्टों से मुक्ति का इच्छुक है, तो उसे भक्ति करनी चाहिए। इसकी पुष्टि स्वयं भगवान् ने भगवद्गीता (४.९) में की है। जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

“हे अर्जुन! जो व्यक्ति मेरे प्राकट्य तथा कर्मों की दिव्य प्रकृति से अवगत है, वह इस शरीर को त्यागने पर इस भौतिक जगत में पुन: जन्म नहीं लेता वरन् मेरे धाम को प्राप्त होता है।” इस प्रकार भक्त पूर्ण कृष्णभक्ति प्राप्त करने पर मृत्यु के पश्चात् इस संसार में फिर नहीं आता। वह भगवान् के धाम को वापस जाता है। यही सुख की चरमावस्था है, जिसमें दुख का लेशमात्र भी नहीं रहता।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥