श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 25: राजा पुरञ्जन के गुणों का वर्णन  »  श्लोक 42

 
श्लोक
कस्या मनस्ते भुवि भोगिभोगयो:
स्त्रिया न सज्जेद्भुजयोर्महाभुज ।
योऽनाथवर्गाधिमलं घृणोद्धत
स्मितावलोकेन चरत्यपोहितुम् ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
कस्या:—किसका; मन:—मन; ते—तुम्हारा; भुवि—इस संसार में; भोगि-भोगयो:—सर्प के समान शरीर वाला; स्त्रिया:—स्त्री का; न—नहीं; सज्जेत्—आकर्षित हो जाता है; भुजयो:—भुजाओं द्वारा; महा-भुज—हे बलिष्ठ भुजाओं वाले, महाबाहु; य:—जो; अनाथ-वर्गा—हम जैसी अनाथ स्त्रियों का; अधिम्—मन का सन्ताप; अलम्—सक्षम; घृणा-उद्धत—छेड़छाड़ से; स्मित- अवलोकेन—आकर्षक हँसी से; चरति—विचरण करता है; अपोहितुम्—कम (शान्त) करने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 हे महाबाहु, इस संसार में ऐसा कौन है, जो सर्प के शरीर जैसी तुम्हारी भुजाओं से आकृष्ट न हो जाये? वास्तव में तुम अपनी मोहक मुस्कान तथा अपनी छेड़छाड़ युक्त दया से हम जैसी पतिविहीन स्त्रियों के सन्ताप को दूर करते हो। हम सोचती हैं कि तुम केवल हमारे हित के लिए ही पृथ्वी पर विचरण कर रहे हो।
 
तात्पर्य
 जब किसी पतिविहीन स्त्री के साथ कोई आक्रमक पुरुष छेड़छाड़ करता है, तो वह इसे कृपा समझती है। स्त्रियाँ सामान्यत: पुरुषों की लम्बी-लम्बी भुजाओं से अत्यधिक आकर्षित होती हैं। सर्प का शरीर गोल होता है और पूँछ की ओर पतला होता जाता है। मनुष्य की सुन्दर भुजाएँ स्त्रियों को सर्पों की भाँति प्रतीत होती हैं और वे ऐसी भुजाओं का आलिंगन चाहती हैं।
इस श्लोक में अनाथवर्गा शब्द अत्यन्त सार्थक है। “नाथ” का अर्थ है “पति” और “अ” का अर्थ है “रहित”। जिस तरुणी के पति नहीं होता वह अनाथ कहलाती है, अर्थात् उसकी रक्षा करने वाला कोई नहीं होता। किशोरावस्था प्राप्त करते ही स्त्री के मन में कामवासना हिलोरें लेने लगती है। अत: पिता का धर्म है कि वय:सन्धि आते ही वह अपनी पुत्री का विवाह कर दे; अन्यथा पति न होने से वह अत्यधिक सन्तप्त रहेगी। इस आयु में जो भी व्यक्ति उसकी कामवासना को तृप्त कर दे, वही उसके लिए सन्तोष देने वाला बन जाता है। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि वय:सन्धि में जो भी व्यक्ति स्त्री की कामवासना को तृप्त कर दे, उसे वह आजीवन प्यार करेगी, चाहे वह जो भी हो। इस प्रकार से इस संसार में तथाकथित प्रेम काम-तुष्टि के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥