श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 26: राजा पुरञ्जन का आखेट के लिए जाना और रानी का क्रुद्ध  »  श्लोक 1-3

 
श्लोक
नारद उवाच
स एकदा महेष्वासो रथं पञ्चाश्वमाशुगम् ।
द्वीषं द्विचक्रमेकाक्षं त्रिवेणुं पञ्चबन्धुरम् ॥ १ ॥
एकरश्म्येकदमनमेकनीडं द्विकूबरम् ।
पञ्चप्रहरणं सप्तवरूथं पञ्चविक्रमम् ॥ २ ॥
हैमोपस्करमारुह्य स्वर्णवर्माक्षयेषुधि: ।
एकादशचमूनाथ: पञ्चप्रस्थमगाद्वनम् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
नारद: उवाच—नारद ने कहा; स:—राजा पुरञ्जन; एकदा—एक बार; महा-इष्वास:—विशाल धनुष बाण लेकर; रथम्—रथ; पञ्च-अश्वम्—पाँच घोड़े; आशु-गम्—तेजी से चलने वाले; द्वि-ईषम्—दो तीर; द्वि-चक्रम्—दो पहिए; एक—एक; अक्षम्— धुरी; त्रि—तीन; वेणुम्—ध्वजाएँ; पञ्च—पाँच; बन्धुरम्—अवरोध, डोरियाँ; एक—एक; रश्मि—लगाम; एक—एक; दमनम्—सारथी; एक—एक; नीडम्—बैठने का स्थान; द्वि—दो; कूबरम्—जुए; पञ्च—पाँच; प्रहरणम्—आयुध; सप्त— सात; वरूथम्—आवरण अथवा शरीर के अवयव; पञ्च—पाँच; विक्रमम्—चालें; हैम—सुनहला; उपस्करम्—आभूषण; आरुह्य—चढ़ कर, सवार होकर; स्वर्ण—सोने का; वर्मा—कवच; अक्षय—न समाप्त होने वाला; इषु-धि:—तरकस; एकादश—ग्यारह; चमू-नाथ:—सेनापतियों; पञ्च—पाँच; प्रस्थम्—गन्तव्य; अगात्—गया; वनम्—वन में ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजन्, एक बार राजा पुरञ्जन ने अपना विशाल धनुष लिया और सोने का कवच धारण करके तरकस में असंख्य तीर भर कर वह अपने ग्यारह सेनापतियों के साथ अपने रथ पर बैठ गया, जिसे पाँच तेज घोड़े खींच रह थे और पञ्चप्रस्थ नामक वन में गया। उसने अपने साथ उस रथ में दो विस्फोटक तीर ले लिये। यह रथ दो पहियों तथा एक घूमते हुए धुरे पर स्थित था। रथ पर तीन ध्वजाएँ, एक लगाम, एक सारथी, एक बैठने का स्थान, दो काठी (जुए), पाँच आयुध तथा सात आवरण थे। यह रथ पाँच भिन्न-भिन्न शैलियों से गति कर रहा था और उसके सामने पाँच अवरोध थे। रथ की सारी साज-सज्जा सोने की बनी थी।
 
तात्पर्य
 इन तीनों श्लोकों में बताया गया है कि किस प्रकार जीव का भौतिक शरीर बहिरंगा शक्ति के तीन गुणों के नियंत्रण में रहता है। यह शरीर रथ है और जीव ही इस शरीर का स्वामी है जैसाकि भगवद्गीता (२.१३) में कहा गया है—देहिनोऽस्मिन्यथा देहे। शरीर (देह) का स्वामी देही कहलाता है और वह इस शरीर के भीतर, विशेषत: हृदय के भीतर, विद्यमान रहता है। जीव एक सारथी द्वारा चलाया जाता है। यह रथ तीन गुणों से बना है, जो कि प्रकृति के तीनों गुण हैं, जिसकी पुष्टि भगवद्गीता (१८.६१) में हुई है—यन्त्रारूढानि मायया। यंत्र का अर्थ है वाहन। यह शरीर प्रकृति द्वारा प्रदत्त है और इस शरीर का चालक है परमात्मा। जीव रथ के भीतर बैठा रहता है। ऐसी है वास्तविक स्थिति।
जीवात्मा सदैव तीन गुणों—सत्त्व, रज तथा तम—द्वारा प्रभावित होता रहता है। इसकी भी पुष्टि भगवद्गीता (७.१३) में हुई है—त्रिभिर्गुणमयैर्भावै:—जीवात्मा प्रकृति के तीन गुणों द्वारा मोहग्रस्त होता रहता है। इस श्लोक में इन तीनों गुणों को तीन पताकाएँ कहा गया है। पताका से कोई भी व्यक्ति जान सकता है कि यह रथ किसका है। इसी प्रकार प्रकृति के तीनों गुणों से यह जाना जा सकता है कि रथ किस दिशा में जा रहा है। दूसरे शब्दों में, जिसके आँखें हैं वह समझ सकता है कि प्रकृति के किसी विशेष गुण द्वारा यह शरीर किधर जा रहा है। इन तीनों श्लोकों में यह बताया गया है कि मनुष्य धार्मिक बनना चाहते हुए भी किस प्रकार तमोगुण से प्रभावित होता है। नारद मुनि प्राचीनबर्हिषत् को दिखा देना चाहते थे कि राजा तमोगुण से प्रभावित है, यद्यपि वह परम धर्मात्मा माना जाता था।

कर्मकाण्डीय के अनुसार मनुष्य वेदों द्वारा निर्देशित विविध यज्ञ सम्पन्न करता है और उन सभी यज्ञों में पशुबलि का आदेश है, ताकि मारे जाने वाले पशुओं के जीवन पर वैदिक मंत्रों की शक्ति की परीक्षा हो सके। पशुबलि निश्चय ही तमोगुण के अधीन होकर की जाती है। भले ही कोई कितना धार्मिक प्रवृत्ति वाला क्यों न हो, पशुबलि की संस्तुति सभी शास्त्रों में, न केवल वेदों में, वरन् अन्य सम्प्रदायों के आधुनिक शास्त्रों तक में है। ये पशु-यज्ञ धर्म के नाम पर किये जाते हैं, किन्तु वास्तव में ये तो तमोगुण वाले व्यक्तियों के निमित्त होते हैं। जब ऐसे लोग पशुओं का वध करते हैं, तो वे धर्म की दुहाई देते हैं। किन्तु जहाँ धर्म दिव्य पद्धति हो—यथा वैष्णव धर्म—वहाँ पशुबलि (यज्ञ) को कोई स्थान प्राप्त नहीं है। ऐसे दिव्य धर्म की संस्तुति श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता (१८.६६) में की है—

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ॥

“तुम सभी धर्मों को छोडक़र केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें समस्त पाप-बन्धनों से मुक्त कर दूँगा। तुम डरो नहीं।” चूँकि राजा प्राचीनबर्हिषत् विविध यज्ञों के करने में व्यस्त था जिनमें पशुओं की हत्या की जाती थी, अत: नारद मुनि ने उसे बताया कि ऐसे यज्ञ तमोगुण से प्रभावित होने के कारण किये जाते हैं। श्रीमद्भागवत के तो प्रारम्भ में ही (१.१.२) कहा गया है—प्रोज्झित कैतवोऽत्र। ऐसे सारे धर्मों को जो ठगी में लगे हैं श्रीमद्भागवत में स्थान प्राप्त नहीं है। भगवद्धर्म जो भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को बताता है—पशुबलि की संस्तुति नहीं की जाती। संकीर्तन-यज्ञ में, जिसमें—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे। हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे—महामंत्र का जप किय जाता है, कहीं भी पशुबलि की संस्तुति नहीं है।

इन तीनों श्लोकों में राजा पुरञ्जन का पशुओं को मारने के लिए जंगल को प्रस्थान करना प्रतीकात्मक रूप से तमोगुण से प्रेरित जीव का विभिन्न इन्द्रियतृप्ति के कार्यों में लगना है। यह भौतिक शरीर स्वयं बताता है कि जीवात्मा प्रकृति के तीन गुणों द्वारा प्रभावित है और उसे भौतिक वस्तुओं का भोग करने के लिए प्रवृत्त किया जा रहा है। जब शरीर तमोगुण से प्रभावित होता है, तो संक्रमण अत्यन्त बिकट होता है। जब शरीर रजोगुण से प्रभावित होता है, तो संक्रमण लक्षणात्मक स्तर पर होता है, किन्तु जब शरीर सतोगुण से प्रभावित होता है, तो यही सांसारिक भौतिक संक्रमण परिशुद्ध हो जाता है। विभिन्न धर्मों में बताये गये धार्मिक अनुष्ठान सतोगुण-स्तर पर ही होते हैं, किन्तु इस भौतिक जगत में कभी-कभी सतोगुण भी अन्य गुणों से दूषित हो जाता है, अत: कभी-कभी सतोगुणी व्यक्ति भी तमोगुण के प्रभाव में आ जाता है।

यहाँ पर इसका वर्णन हुआ है कि एक बार राजा पुरञ्जन पशुओं का वध करने के लिए जंगल में गया। इसका अर्थ यही होता है कि जीवात्मा तमोगुण के प्रभाव में आ गया। जिस जंगल में राजा आखेट करने लगा उसका नाम पञ्चप्रस्थ था। पञ्च का अर्थ “पाँच” होता है, अत: यह पाँच इन्द्रिय वस्तुओं (विषयों) का सूचक है। शरीर में पाँच कर्मेन्द्रियाँ होती हैं—हाथ, पाँव, जीभ, गुदा तथा जननेद्रिय। इन कर्मेन्द्रियों का पूरा-पूरा लाभ उठाकर शरीर भौतिक जीवन का भोग करता है। रथ को पाँच घोड़े खींच रहे हैं, जो पाँच इन्द्रियों—आँख, कान, नाक, त्वचा तथा जीभ-के प्रतीक हैं। ये इन्द्रियाँ विषयों के प्रति शीघ्र आकृष्ट होती हैं, फलस्वरूप घोड़ों को तेजी से चलने वाला बताया गया है। राजा पुरञ्जन के रथ में दो विस्फोटक आयुध हैं जिनकी तुलना अहंकार से की जा सकती है। इस अहंकार की दो प्रवृत्तियाँ होती हैं—मैं यह शरीर हूँ (अहन्ता ) और मेरे सभी शारीरिक सम्बन्धी मेरे हैं (ममता )।

रथ के दोनों पहिए दो गतियील सुविधाओं जैसे हैं—पापी जीवन तथा धार्मिक जीवन। रथ तीन पताकाओं से सुसज्जित है, जो प्रकृति के तीनों गुणों के द्योतक हैं। पाँच प्रकार के अवरोध पंचवायु हैं, जो शरीर के भीतर प्रवाहित होते हैं। ये हैं—प्राण, अपान, उदान, समान तथा व्यान। शरीर में सात आवरण पाये जाते हैं—ये हैं त्वचा, पेशी, वसा, रक्त, मज्जा, अस्थि तथा वीर्य। जीव तीन सूक्ष्म तथा पाँच स्थूल तत्त्वों से ढका है। ये वास्तव में वे अवरोध हैं, जो जीव को भौतिक बन्धन से मोक्ष के मार्ग में जाते हुए मिलते हैं।

इस श्लोक में रश्मि (रस्सी) शब्द मन का सूचक है। नीड शब्द भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि नीड तो पक्षियों का घोंसला होता है। यहाँ पर नीड हृदय है जहाँ पर जीवात्मा स्थित है। जीवात्मा केवल एक स्थान पर बैठता है। उसके बन्धन के दो कारण होते हैं—शोक तथा मोह। इस संसार में जीवात्मा उसी वस्तु के पीछे दौड़ता है, जो उसे कभी मिल नहीं सकती। अत: वह मोह में पड़ा रहता है। ऐसी मोहग्रस्त दशा में होने से वह सदैव शोक करता रहता है। इस प्रकार शोक तथा मोह द्विकूबर अर्थात् बन्धन के दो स्थान कहे गये हैं।

जीवात्मा अपनी सारी इच्छाएँ पाँच विभिन्न विधियों से पूरी करता है, जो उसकी कर्मेन्द्रियों को सूचित करती हैं। सुनहरे आभूषण तथा वस्त्र सूचित करते हैं कि जीवात्मा रजोगुण से प्रभावित है। जिस व्यक्ति के पास अकूत धन होता है, वह विशेष रूप से रजोगुण के वश में होता है। रजोगुण के कारण वह इस संसार में अनेक वस्तुओं का भोग करना चाहता है। ग्यारह सेनापति दस इन्द्रियों तथा मन के सूचक हैं। मन सदैव दस सेनापतियों के साथ मिलकर संसार के भोग की योजनाएँ बनाता रहता है। पञ्चप्रस्थ नामक जंगल, जहाँ राजा आखेट करने गया था, पाँच इन्द्रिय विषयों—रूप, स्वाद, शब्द, गंध तथा स्पर्श—का जंगल है। इस प्रकार इन तीन श्लोकों में नारद मुनि भौतिक शरीर की स्थिति तथा इसके भीतर जीवात्मा के बन्दी होने का वर्णन करते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥