श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 26: राजा पुरञ्जन का आखेट के लिए जाना और रानी का क्रुद्ध  »  श्लोक 14

 
श्लोक
अन्त:पुरस्त्रियोऽपृच्छद्विमना इव वेदिषत् ।
अपि व: कुशलं रामा: सेश्वरीणां यथा पुरा ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
अन्त:-पुर—रनिवास की; स्त्रिय:—स्त्रियों से; अपृच्छत्—पूछा; विमना:—अत्यन्त उत्सुक होकर; इव—मानो; वेदिषत्—हे राजा प्राचीनबर्हि; अपि—क्या; व:—तुम्हारी; कुशलम्—कुशल मंगल; रामा:—हे सुन्दरियो; स-ईश्वरीणाम्—अपनी मालकिन या स्वामिनी सहित; यथा—जिस तरह; पुरा—पहले ।.
 
अनुवाद
 
 उस समय राजा पुरञ्जन कुछ-कुछ उत्सुक हुआ और उसने रनिवास की स्त्रियों से पूछा: हे सुन्दरियो, तुम सब अपनी स्वामिनी सहित पहले के समान प्रसन्न तो हो?
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में वेदिषत् शब्द राजा प्राचीनबर्हि का सूचक है। जब मनुष्य भक्तों की संगति में आकर अपने में नवीनता पाता है और उसमें कृष्णभक्ति जगती है, तो वह अपने मनोरथ से सलाह लेता है—अर्थात् सोचता, अनुभव करता तथा चाहता है—और यह निश्चय करता है कि वह भौतिक कार्यों में लौट जाये या कि आध्यात्मिक चेतना में अडिग रहे। कुशलम् शब्द जो कुछ शुभ है उसका सूचक है। यदि मनुष्य भगवान् विष्णु की भक्ति में लग जाये तो वह अपने घर को पूर्णत: शुभ बना सकता है। जब कोई विष्णु भक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी कार्य में लगता है, अर्थात् भौतिक कार्यों में लगता है, तो वह सदैव चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है। विचारवान् व्यक्ति को चाहिए कि अपने मन से सलाह ले और तय करे कि मन की इन प्रवृत्तियों का किस प्रकार उपयोग किया जाये। यदि कोई श्रीकृष्ण के विषय में ही निरन्तर सोचता है, उनकी सेवा करने का विचार करता है और उन्हीं की आज्ञा पालन करने की कामना करता है, तो यह समझना चाहिए कि उसने अपनी बुद्धि से अच्छी शिक्षा प्राप्त की है, क्योंकि बुद्धि तो माता है। यद्यपि राजा विश्रान्त हो चुका था फिर भी उसने अपनी पत्नी के विषय में पूछा। इस तरह वह सलाह ले रहा था, सोच रहा था और चाह रहा था कि वह अपनी स्थिर उत्तम चेतना की ओर फिर से कैसे लौटे। मन सलाह दे सकता है कि विषय-भोग से मनुष्य प्रसन्न रह सकता है, किन्तु जब वह कृष्णचेतना में आगे बढ़ जाता है, तो भौतिक कार्यों में उसे सुख नहीं मिलता। इसकी व्याख्या भगवद्गीता (२.५९) में की गई है—
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन:।

रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥

“देहधारी जीव को इन्द्रिभोग से रोका जा सकता है, परन्तु विषयासक्ति बनी रहती है। किन्तु उच्च रस के अनुभव द्वारा ऐसे व्यापारों को त्यागकर वह चेतना (बुद्धियोग) में स्थिर हो जाता है।” जब तक मनुष्य अपने को भक्ति के श्रेष्ठ व्यापार में न लगा ले वह इन्द्रिय-विषयों से विरक्त नहीं हो सकता। परं दृष्ट्वा निवर्तते। कोई तभी भौतिक कार्यों को छोड़ सकता है जब वह सचमुच भक्ति करने में लग जाये।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥