श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 26: राजा पुरञ्जन का आखेट के लिए जाना और रानी का क्रुद्ध  »  श्लोक 16

 
श्लोक
क्‍व वर्तते सा ललना मज्जन्तं व्यसनार्णवे ।
या मामुद्धरते प्रज्ञां दीपयन्ती पदे पदे ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
क्व—कहाँ; वर्तते—इस समय है; सा—वह; ललना—स्त्री; मज्जन्तम्—डूबते हुए; व्यसन-अर्णवे—संकट के सागर में; या— जो; माम्—मुझको; उद्धरते—उबारती है; प्रज्ञाम्—सद्बुद्धि; दीपयन्ती—जागृत करके; पदे पदे—प्रत्येक पग पर ।.
 
अनुवाद
 
 कृपया मुझे उस सुन्दरी का पता बताओ जो मुझे सदैव संकट के समुद्र में डूबने से उबारती है। वह मुझे पग-पग पर सद्बुद्धि प्रदान करके बचाती है।
 
तात्पर्य
 अच्छी पत्नी तथा सद्बुद्धि में कोई अन्तर नहीं होता। जिसके सद्बुद्धि होती है, वह ठीक से विचार-विमर्श कर सकता है और अपने आपको संकटों से बचा सकता है। इस संसार में पग-पग पर संकट है। श्रीमद्भागवत (१०.१४.५८) में कहा गया है—पदं-पदं यद् विपदां न तेषां। यह भौतिक संसार वास्तव में बुद्धिमान लोगों या भक्तों के रहने का स्थान नहीं है, क्योंकि पग-पग पर संकट हैं। भक्त के लिए तो वैकुण्ठ ही असली स्थान है, जहाँ न चिन्ता है और न संकट। सद्बुद्धि का अर्थ है कृष्णभक्त होना। श्रीचैतन्य-चरितामृत में कहा गया है—कृष्ण ये भजे से बड़ चतुर। जब तक कोई कृष्णभक्त नहीं बनता उसे बुद्धिमान (चतुर) नहीं कहा जा सकता।
यहाँ हम देखते हैं कि राजा पुरञ्जन अपनी सुभार्या को खोज रहा है, जो उसे इस संसार में मिलने वाली संकटमय परिस्थितियों से बचाती रहती थी। जैसा पहले कहा जा चुका है असली पत्नी धर्मपत्नी होती है, जिसे धार्मिक नियमों के अनुसार स्वीकार किया गया हो। धर्मपत्नी से उत्पन्न सन्तानें पिता की सम्पत्ति की उत्तराधिकारी होती हैं, किन्तु अविवाहिता पत्नी से उत्पन्न सन्तान को पिता की सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता। धर्मपत्नी शब्द पतिव्रता पत्नी का भी सूचक है। पतिव्रता पत्नी वह है, जो विवाह के पूर्व किसी भी पुरुष से कोई सम्बन्ध नहीं रखती। यदि एक बार स्त्री को अपनी युवावस्था में सभी प्रकार के पुरुषों से मिलने-जुलने दिया जाता है, तो उसका पतिव्रता रह पाना कठिन हो जाता है। सामान्यत: वह पतिव्रता नहीं रह सकती। जब मक्खन को आग के निकट लाया जाता है, तो वह पिघल जाता है। स्त्री अग्नि के समान है और पुरुष मक्खन के समान। किन्तु यदि मनुष्य को पतिव्रता पत्नी मिल जाये जो धार्मिक विवाह संस्कार के द्वारा स्वीकृत की गई है, तो वह संकटमय परिस्थितियों में अत्यधिक सहायक हो सकती है। वास्तव में ऐसी पत्नी समस्त सद्बुद्धि का उद्गम है। ऐसी पत्नी होने से यदि परिवार भगवद्भक्ति करता है, तो वह घर वास्तव में गृहस्थाश्रम बन जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥