श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 26: राजा पुरञ्जन का आखेट के लिए जाना और रानी का क्रुद्ध  »  श्लोक 18

 
श्लोक
नारद उवाच
पुरञ्जन: स्वमहिषीं निरीक्ष्यावधुतां भुवि ।
तत्सङ्गोन्मथितज्ञानो वैक्लव्यं परमं ययौ ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
नारद: उवाच—नारद मुनि ने कहा; पुरञ्जन:—राजा पुरञ्जन; स्व-महिषीम्—अपनी रानी को; निरीक्ष्य—देखकर; अवधुताम्— साधु की तरह; भुवि—पृथ्वी पर; तत्—उसके; सङ्ग—साथ से; उन्मथित—प्रोत्साहित; ज्ञान:—जिसका ज्ञान; वैक्लव्यम्— मोहग्रस्त; परमम्—परम; ययौ—हो गया ।.
 
अनुवाद
 
 महर्षि नारद ने कहा : हे राजा प्राचीनबर्हि, जैसे ही राजा पुरञ्जन ने अपनी रानी को अवधूत की भाँति पृथ्वी पर लेटे देखा, वह तुरन्त मोहग्रस्त हो गया।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक का अवधुताम् शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह उस साधु के लिए प्रयुक्त होता है, जिसे अपने शरीर की सुधि-बुधि नहीं रहती। चूँकि रानी बिना बिस्तर के अस्त-व्यस्त वस्त्रों सहित जमीन पर लेटी थी, इसलिए राजा पुरञ्जन अत्यधिक दुखी हुआ। दूसरे शब्दों में, उसे इसका पश्चात्ताप हुआ कि उसने अपनी बुद्धि की उपेक्षा की है और स्वयं जंगल जाकर पशुवध में व्यस्त रहा है। तात्पर्य यह कि जब मनुष्य अपनी बुद्धि की उपेक्षा करता है या उससे विलग हो जाता है, तो वह पापकर्म में प्रवृत्त होता है। अपनी सद्बुद्धि या कृष्णचेतना की उपेक्षा के कारण वह मोहग्रस्त होता है और पापकर्मों में लग जाता है। जब इसका एहसास होता है, तो वह पश्चात्ताप करता है। ऐसे पश्चात्ताप का वर्णन नरोत्तमदास ठाकुर ने किया है—
हरि-हरि विफले जनम गोङाइनु मनुष्य-जन्म पाइया; राधा कृष्ण ना भजिया जानिया शुनिया विष खाइनु वे कहते हैं कि मुझे अपना मनुष्य-जन्म बर्बाद करने तथा जानबूझ कर विष पीने का पछतावा है। कृष्ण-भक्त न बनकर मनुष्य जानबूझ कर भौतिक जीवन का विषपान करता है। सारांश यह है कि अपनी सतीसाध्वी पत्नी के अभाव में या यह कहें कि जब वह अपनी बुद्धि खो देता है और कृष्णभक्ति नहीं करता तो मनुष्य निश्चित रूप से पापकर्म में प्रवृत्त होता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥