श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 26: राजा पुरञ्जन का आखेट के लिए जाना और रानी का क्रुद्ध  »  श्लोक 22

 
श्लोक
परमोऽनुग्रहो दण्डो भृत्येषु प्रभुणार्पित: ।
बालो न वेद तत्तन्वि बन्धुकृत्यममर्षण: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
परम:—परम; अनुग्रह:—कृपा; दण्ड:—दण्ड; भृत्येषु—दासों पर; प्रभुणा—स्वामी द्वारा; अर्पित:—दिया गया; बाल:—मूर्ख; न—नहीं; वेद—जानता है; तत्—उस; तन्वि—हे तन्वंगी; बन्धु-कृत्यम्—मित्र का कर्तव्य; अमर्षण:—क्रुद्ध ।.
 
अनुवाद
 
 हे तन्वंगी, जब कोई स्वामी अपने सेवक को दण्ड देता है, तो उसे परम अनुग्रह समझ कर स्वीकार कर लेना चाहिए। जो क्रुद्ध होता है, वह अत्यन्त मूर्ख है और वह यह नहीं जानता कि ऐसा करना तो उसके मित्र का कर्तव्य होता है।
 
तात्पर्य
 कहा जाता है कि यदि मूर्ख को अच्छी बात भी सिखाई जाये तो वह उसे नहीं मानता। उल्टे वह क्रुद्ध होता है। ऐसे क्रोध की उपमा सर्प-विष से दी जाती है, क्योंकि जब साँप को दूध और केला खिलाया जाता है, तो इससे
उसका विष बढ़ता ही है। दयालु और नम्र होने की बजाय अच्छी वस्तुएँ खिलाये जाने पर साँप अपना विष बढ़ाता है। इसी प्रकार मूर्ख को उपदेश देने पर वह अपने को सुधारने के बजाय उल्टे क्रुद्ध होता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥