श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 26: राजा पुरञ्जन का आखेट के लिए जाना और रानी का क्रुद्ध  »  श्लोक 6

 
श्लोक
तीर्थेषु प्रतिद‍ृष्टेषु राजा मेध्यान् पशून् वने ।
यावदर्थमलं लुब्धो हन्यादिति नियम्यते ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
तीर्थेषु—पवित्र स्थानों में; प्रतिदृष्टेषु—वेदों के आदेशानुसार; राजा—राजा; मेध्यान्—वध के योग्य; पशून्—पशुओं को; वने—वन में; यावत्—जब तक; अर्थम्—आवश्यकतानुसार; अलम्—इससे अधिक नहीं; लुब्ध:—लालची बनकर; हन्यात्— वध करे; इति—इस प्रकार; नियम्यते—नियमित करता है ।.
 
अनुवाद
 
 यदि राजा मांस खाने का अत्यधिक इच्छुक हो तो वह यज्ञ के लिए शास्त्रों में दिये गये आदेशों के अनुसार बन जाकर कुछ केवल वध्य पशुओं का वध करे। किसी को वृथा ही या बिना रोकटोक पशुओं के वध की अनुमति नहीं है। वेद उन मूर्ख पुरुषों के द्वारा अंधाधुंध पशुवध को नियमित करते हैं, जो तमोगुण तथा अविद्या द्वारा प्रभावित रहते हैं।
 
तात्पर्य
 यह प्रश्न किया जा सकता है कि जीव द्वारा इन्द्रियतृप्ति पर क्यों प्रतिबन्ध लगाया जाये? यदि राजा वध सीखने के लिए जंगल जाकर पशुओं का वध कर सकता है, तो फिर इन्द्रियधारी जीव को निर्बन्ध इन्द्रियतृप्ति क्यों न करने दी जाये? इस समय यह तर्क उन तथाकथित स्वामियों तथा योगियों द्वारा भी दिया जाता है, जो यह खुले आम कहते हैं कि जब हमारे पास इन्द्रियाँ हैं, तो फिर उनकी तृप्ति क्यों न की जाये। किन्तु ये मूर्ख स्वामी तथा योगी शास्त्रों के आदेशों को नहीं जानते। कभी-कभी इनमें से कुछ मूढ़ तो शास्त्रों का विरोध तक करते हैं। यहाँ तक कि वे भरी सभा में घोषित करते हैं कि शास्त्रों या अन्य ग्रन्थों की कोई आवश्यकता नहीं है। वे कहते हैं “मेरे पास आओ, मेरे स्पर्श करते ही तुम तुरन्त ब्रह्मभूत हो जाओगे।”
चूँकि आसुरी लोग चाहते हैं कि वे ठगे जाँय, अत: उन्हें ठगने वालों की कमी नहीं है। कलियुग में इस समय तो सम्पूर्ण मानव-समाज ऐसे ठगों एवं ठगे जाने वालों से भरा पड़ा है। इसीलिए वैदिक शास्त्रों ने इन्द्रियतृप्ति के लिए समुचित आदेश दिये हैं। इस युग में प्रत्येक व्यक्ति मांस तथा मछली खाना, शराब पीना और विषयभोग में लिप्त रहना चाहता है, किन्तु वैदिक आदेशानुसार संभोग की अनुमति केवल विवाहित जीवन में है, मांस-भक्षण केवल उन पशुओं का विहित है, जो मार कर देवी काली पर चढ़ाये गये हों तथा मादक द्रव्य-सेवन की केवल सीमित रूप में अनुमति है। इस श्लोक का नियम्यते शब्द सूचित करता है कि पशु-वध, मादक-द्रव्य सेवन तथा विषयभोग नियमित होना चाहिए।

नियम मनुष्यों के लिए होते हैं, पशुओं के लिए नहीं। सडक़-परिवहन के नियम कि दाहिने या बाएँ चलो मनुष्यों के लिए बने हैं न कि पशुओं के लिए। यदि कोई पशु इन नियमों का उल्लंघन करे तो उसे दण्डित नहीं किया जाता, किन्तु मनुष्य को किया जाता है। वेद पशुओं के लिए नहीं, अपितु मानव-समाज द्वारा समझे जाने के लिए हैं। जो व्यक्ति बिना विवेक के वेदों द्वारा दिये गये विधि विधानों का अतिक्रमण करता है, वह दण्डनीय है। अत: मनुष्य को चाहिए कि अपनी कामवासनाओं के अनुसार इन्द्रियों का भोग न करे, वरन् वेदों में दिये गये नियमों के अनुसार अपने को नियमित करे। यदि राजा को जंगल में आखेट करने की अनुमति है, तो वह उसकी इन्द्रियतृप्ति के लिए नहीं है। हम वध करने की कला के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। यदि राजा चोर-उचक्कों से डरता है, किन्तु दीन पशुओं को मार कर बड़े ही आनन्द से घर पर उनका मांस खाता है, तो उसे राजा बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। उससे उसका पद ले लिया जाना चाहिए। चूँकि इस युग में राजाओं में आसुरी वृत्तियाँ होती हैं, इसीलिए प्रत्येक देश में प्रकृति के नियमों द्वारा राजतंत्र का सफाया हो रहा है। इस युग में लोग इतने गिर चुके हैं कि एक ओर वे बहुविवाह पर प्रतिबन्ध लगा रहे हैं और दूसरी ओर नाना प्रकार से स्त्रियों की खोज में रहते हैं। अनेक व्यापारिक प्रतिष्ठान विज्ञापित करते रहते हैं कि अमुक क्लब या दूकान में टापलेस (नंगी) युवतियाँ उपलब्ध हैं। इस प्रकार आधुनिक समाज में स्त्रियाँ इन्द्रियभोग की साधन बन गई हैं। किन्तु वेदों का वचन है कि यदि किसी को एक से अधिक स्त्री को भोगने की रुचि है—जैसाकि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कभी-कभी शूद्र वर्णों में होता है—तो वह एक से अधिक विवाह कर सकता है। विवाह का अर्थ है स्त्री का पूरा-पूरा उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेना और बिना विषयासक्ति के शान्तिपूर्वक रहना। किन्तु इस समय विषयासक्ति अनियंत्रित है। तो भी समाज में यह नियम बनाया जाता है कि कोई एक से अधिक विवाह नहीं कर सकता। यह आसुरी समाज का अनोखापन है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥