श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 26: राजा पुरञ्जन का आखेट के लिए जाना और रानी का क्रुद्ध  »  श्लोक 7

 
श्लोक
य एवं कर्म नियतं विद्वान् कुर्वीत मानव: ।
कर्मणा तेन राजेन्द्र ज्ञानेन न स लिप्यते ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; एवम्—इस प्रकार; कर्म—कार्य; नियतम्—नियमित; विद्वान्—विद्वान्; कुर्वीत—करना चाहिए; मानव:—मनुष्य; कर्मणा—ऐसे कार्यों से; तेन—इससे; राज-इन्द्र—हे राजा; ज्ञानेन—ज्ञान से; न—कभी नहीं; स:—वह; लिप्यते—लिप्त होता है ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने राजा प्राचीनबर्हिषत् से आगे कहा : हे राजा, जो व्यक्ति शास्त्रानुमोदित कर्मों का आचरण करता है, वह सकाम कर्मों में लिप्त नहीं होता।
 
तात्पर्य
 जिस प्रकार से सरकार नागरिकों को विशेष रूप से कार्य के लिए कुछ व्यापार-अनुमति पत्र बनाती है, उसी प्रकार वेदों में ऐसे आदेश हैं, जो हमारे सकाम कर्मों को नियंत्रित एवं नियमित करते हैं। सभी जीव इस संसार में अपने आप भोग के लिए आये हैं; फलत: इन्द्रियभोग को नियमित करने के लिए वेद हैं। जो व्यक्ति वैदिक नियमों के अनुसार इन्द्रिय भोग करता है, वह अपने कर्मों एवं उनके फलों में बँधता नहीं। भगवद्गीता (३.९) में आया है—यज्ञार्थात् कर्मण:—मनुष्य को यज्ञ के लिए अर्थात् विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कर्म करना चाहिए। अन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:—अन्यथा कोई भी कर्मफल जीव के बन्धन का कारण बनेगा। मनुष्य विशेष रूप से जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग के बन्धन से छुटकारा प्राप्त करने के निमित्त है। अत: उसे वैदिक नियमों के अनुसार आचरण करना होता है, जिससे वह अपनी इन्द्रियतृप्ति की इच्छाओं को पूरा कर ले और साथ ही धीरे-धीरे भवबन्धन से भी मुक्त हो ले। ऐसे नियमों के अनुसार किया गया कर्म ज्ञान कहलाता है। वस्तुत:, वेद शब्द का अर्थ ही “ज्ञान” है। ज्ञानेन न स लिप्यते बताता है कि वैदिक नियमों का पालन करने से मनुष्य कर्मों तथा उनके फलों के बन्धन में नहीं फँसता।
इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति को वैदिक आदेशानुसार आचरण करने का उपदेश दिया जाता है न कि गैर जिम्मेदार तरीके से। जब कोई व्यक्ति किसी राज्य के नियमों तथा लाइसेंसों के अनुसार कार्य करता है, तो वह किसी अपराधिक कृत्य में नहीं फंसता। किन्तु मानवनिर्मित नियम सदैव दोषपूर्ण होते हैं, क्योंकि वे ऐसे व्यक्तियों द्वारा बनाये जाते हैं, जो त्रुटियाँ कर सकते हैं, मोहग्रस्त हो सकते हैं, ठगे जा सकते हैं और अपूर्ण इन्द्रियों वाले होते हैं। किन्तु वैदिक आदेश इनसे भिन्न हैं, क्योंकि उनमें ये चारों दोष नहीं पाये जाते। वैदिक आदेशों में त्रुटि नहीं हो सकती। वैदिक ज्ञान सीधे ईश्वर से प्राप्त होता है, अत: उसमें ठगी, मोह, त्रुटियों, इन्द्रियों की अपूर्णता का प्रश्न ही नहीं उठता। सारा वैदिक ज्ञान पूर्ण है, क्योंकि वह परम्परा द्वारा ईश्वर से प्राप्त हुआ है। श्रीमद्भागवत (१.१.१) में कहा गया है—तेने ब्रह्म हृदा य आदि कवये। इस ब्रह्माण्ड के आदि प्राणी को, जो आदि कवि या ब्रह्मा कहलाता है, श्रीकृष्ण द्वारा अन्त:करण में उपदेश दिया गया था। श्रीकृष्ण से इन आदेशों को प्राप्त करके ब्रह्मा ने इस ज्ञान को परम्परा विधि से नारद को प्रदान किया और नारद ने इसे व्यास को दिया। इस प्रकार वैदिक ज्ञान परिपूर्ण है। यदि हम वैदिक ज्ञान के अनुसार आचरण करते हैं, तो पापकर्मों में फँसने का प्रश्न ही नहीं उठता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥