श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 26: राजा पुरञ्जन का आखेट के लिए जाना और रानी का क्रुद्ध  »  श्लोक 8

 
श्लोक
अन्यथा कर्म कुर्वाणो मानारूढो निबध्यते ।
गुणप्रवाहपतितो नष्टप्रज्ञो व्रजत्यध: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
अन्यथा—नहीं तो; कर्म—सकाम कर्म; कुर्वाण:—करते हुए; मान-आरूढ:—अभिमान के वशीभूत होकर; निबध्यते—फँस जाता है; गुण-प्रवाह—गुणों के प्रभाव से; पतित:—गिरा हुआ, पतित; नष्ट-प्रज्ञ:—बुद्धिभ्रष्ट; व्रजति—जाता है; अध:—गर्त में, नीचे ।.
 
अनुवाद
 
 अन्यथा जो मनुष्य मनमाना कर्म करता है, वह मिथ्या अभिमान के कारण नीचे गिर जाता है और इस तरह प्रकृति के तीनों गुणों में फँस जाता है। इस प्रकार से जीव अपनी वास्तविक बुद्धि से रहित हो जाता है और जन्म-मृत्यु के चक्र में सदा-सदा के लिए खो जाता है। इस प्रकार वह मल के एक सूक्ष्म जीवाणु से लेकर ब्रह्मलोक में उच्च पद तक ऊपर-नीचे आता-जाता रहता है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में कई शब्द महत्त्वपूर्ण हैं। पहला है अन्यथा “नहीं तो,” जो उस की ओर संकेत करता है, जिसे वैदिक विधि-विधानों की परवाह नहीं रहती। वेदों द्वारा निर्दिष्ट विधि-विधान शास्त्र-विधि कहलाते हैं। भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया है कि जो शास्त्र-विधि को स्वीकार नहीं करता है और मनमाना कार्य करता है अथवा मिथ्या गर्व से फूला रहता है, उसे इस जीवन में न तो कभी सिद्धि प्राप्त होती है और न सुख अथवा भौतिकता से मुक्ति ही मिलती है।
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:।

न स सिद्धिमाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥

“जो शास्त्रों के आदेशों की अवहेलना करता है और मनमाने ढंग से कार्य करता है उसे न तो सिद्धि मिलती है, न सुख अथवा परम धाम” (भगवद्गीता १६.२३)। इस प्रकार जो जानबूझ कर शास्त्र-विधि का उल्लंघन करता है, वह अपने ही कारण से प्रकृति के गुणों द्वारा उतना ही इस संसार में फँसता जाता है। अत: मानव-समाज को जीवन के वैदिक नियमों का पालन करना चाहिए जिनका सार भगवद्गीता में उपलब्ध हैं। अन्यथा भौतिक संसार में ही जीवन बिताना होगा। मूर्ख लोग नहीं जानते कि जीव चौरासी लाख योनियों में घूमता रहता है। क्रमिक विकास-विधि के द्वारा जब किसी को मनुष्य का रूप प्राप्त होता है, तो उससे आशा की जाती है कि वह वेदों द्वारा निर्दिष्ट विधि-विधानों का पालन करेगा। श्री चैतन्य महाप्रभु का कहना है कि अनादि काल से जीव अपनी आसुरी प्रवृत्ति के कारण प्रकृतिजन्य त्रयतापों को सहता आ रहा है; यह प्रवृत्ति भगवान् के प्रति विद्रोह करने की भावना है। श्रीकृष्ण ने भी भगवद्गीता (१५.७) में इसकी पुष्टि की है—

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।

मन: षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

“इस बद्ध जगत में जीवात्माएँ मेरे शाश्वत अंश के रूप में हैं। बद्ध जीवन के कारण उन्हें मन समेत अपनी छहों इन्द्रियों से अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता है।” प्रत्येक जीवात्मा भगवान् का अंश है, अत: उसे इस संसार के त्रयतापों में डाले जाने का कोई कारण नहीं है, किन्तु जीव अपने को झूठे ही भोक्ता मान कर स्वेच्छा से इस भौतिक अस्तित्व को स्वीकार कर लेता है। उसे इस भयावह स्थिति से बचाने के लिए ही भगवान् ने व्यासदेव का अवतार लेकर सारा वैदिक साहित्य प्रदान किया है। इसीलिए कहा गया है—

कृष्ण भुलि’ सेइ जीव अनादि-बहिर्मुख।

अतएव माया तारे देय संसार-दु:ख ॥

“श्रीकृष्ण को भुलाने के कारण जीव अनादिकाल से भौतिकतावादी बन गया है। अत: श्रीकृष्ण की माया उसे इस जगत में नाना प्रकार के कष्ट दे रही है।”(श्रीचैतन्य-चरितामृत, मध्य २०.११७)। माया-मुग्ध जीवेर नाहि स्वत: कृष्ण-ज्ञान।

जीवेरे कृपाय कैला कृष्ण वेद-पुराण ॥

“जब जीव माया द्वारा मुग्ध कर लिया जाता है, तो उसकी कृष्णचेतना पुनरूज्जीवित नहीं हो पाती। ऐसी परिस्थिति में कृष्ण ने कृपा करके चार वेद तथा अठारह पुराण प्रदान किये हैं।” (चैतन्य चरितामृत, मध्य २०.१२२)। इसीलिए प्रत्येक मनुष्य को वैदिक आदेशों का लाभ उठाना चाहिए, अन्यथा वह मनमाने कार्य करेगा और बिना किसी मार्गदर्शक के रह जाएगा।

इस श्लोक में मानारूढ: शब्द भी महत्त्वपूर्ण है। महान् विचारक तथा वैज्ञानिक बनने के बहाने विश्वभर के लोग मानसिक स्तर पर कार्य कर रहे हैं। ऐसे व्यक्ति सामान्यत: अभक्त होते हैं, क्योंकि वे प्रथम जीव ब्रह्माजी को भगवान् द्वारा दिये गये उपदेशों की परवाह नहीं करते। इसीलिए भागवत का (५.१८.१२) कथन है—

हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहि:।

जो व्यक्ति भक्त नहीं है (अभक्त) वह बौद्धिक स्तर पर कार्य करने के कारण सुपात्र नहीं होता। ऐसे व्यक्ति को समय-समय पर अपने ज्ञान का मानक बदलना पड़ता है। फलस्वरूप हम देखते हैं कि एक दार्शनिक दूसरे से सहमत नहीं होता और एक वैज्ञानिक दूसरे वैज्ञानिक के सर्वथा विपरीत सिद्धान्त प्रस्तुत कर सकता है। इसका एकमात्र कारण ज्ञान के किसी मानक (आदर्श) के बिना मानसिक स्तर पर काम करते रहना है। किन्तु वैदिक आदेशों में ज्ञान का मानक स्वीकृत है—भले ही कभी-कभी कथन परस्पर विरोधी लगे। चूँकि वेद ज्ञान के मानक हैं, अत: भले वे विरोधी लगें, किन्तु उन्हें मानना चाहिए। यदि उन्हें स्वीकार नहीं किया जाता तो फिर भव-बन्धन में पड़े रहना होता है। इस श्लोक में भौतिक परिस्थितियों को गुण-प्रवाह कहा गया है। अत: श्रीभक्ति-विनोद ठाकुर ने अपने एक गीत में कहा है—मिछे मायार वशे, याच्छ भेसे’खाच्छा हाबुडुबु भाइ—“तुम क्यों कष्ट उठा रहे हो? तुम कभी प्रकृति की तरंगों में ऊपर और कभी नीचे क्यों जा रहे हो।” जीव कृष्ण दास, ए विश्वास, कर्ले त’आर दु:ख नाइ—“अत: तुम अपने आपको कृष्ण का दास मान लो। तब तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे।” ज्योंही कोई कृष्ण की शरण में आता है और भगवद्गीता को ज्ञान के पूर्ण मानक रूप में स्वीकार कर लेता है, वह प्रकृति के गुणों से बाहर आ जाता है और वह कभी नीचे नहीं गिरता तथा अपने ज्ञान को नहीं खोता।

नष्टप्रज्ञ:। प्रज्ञ का अर्थ है “पूर्ण ज्ञान,” और नष्टप्रज्ञ का अर्थ है “जिसे पूर्ण ज्ञान नहीं है।” जिसे पूर्ण ज्ञान नहीं होता उसके पास केवल अनुमान (मनोधर्म) रहता है। ऐसे मनोधर्म से मनुष्य नीचे की ओर गिरता हुआ नारकीय अवस्था को प्राप्त होता है। शास्त्रों द्वारा निर्धारित नियमों का उल्लंघन करने से मनुष्य का हृदय शुद्ध नहीं हो सकता और जब हृदय शुद्ध नहीं होता तो वह प्रकृति के तीनों भौतिक गुणों के अनुसार कार्य करता है। इन कार्यों का सुन्दर वर्णन भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में श्लोक १ से लेकर ६ में हुआ है। भगवद्गीता (२.४५) में यह भी बताया गया है—

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।

निर्द्वन्द्वो नित्य सत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥

“वेदों में प्रकृति के तीन गुणों के विषय में ही मुख्य रूप से वर्णन है। हे अर्जुन! इन तीन गुणों से ऊपर उठो। इन सबसे परे (अतीत) हो जाओ। समस्त द्वन्द्वों तथा लाभ और सुरक्षा की समस्त चिन्ताओं से मुक्त बनो और आत्मपरायण होओ।” सम्पूर्ण संसार तथा सारा भौतिक ज्ञान इन तीन गुणों में निहित है। मनुष्य को इन तीनों से ऊपर उठना होता है और इस दिव्य पद को पाने के लिए भगवान् के आदेशों का पालन करना होता है। इस प्रकार यह जीवन सार्थक हो जाता है। अन्यथा वह भौतिक प्रकृति के तीन गुणों की लहरों से नीचे फेंक दिया जाएगा। इसकी आगे की व्याख्या प्रह्लाद महाराज के शब्दों में श्रीमद्भागवत (७.५.३०) में प्राप्त है—

मतिर्न कृष्णे परत: स्वतो वा मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम्।

अन्दान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं पुन: पुनश्चर्वितचर्वणानाम् ॥

भौतिकतावादी व्यक्ति भौतिक सुखों में इतने अधिक व्यस्त रहते हैं कि उन्हें अपने भौतिक अनुभवों के अतिरिक्त कुछ भी पता नहीं रहता और वे प्रकृति के गुणों की लहर में बह जाते हैं। वे चर्वितचर्वण का जीवन व्यतीत करते हैं और वे अपनी अनियंत्रित इन्द्रियों द्वारा संचालित होते हैं। इस प्रकार वे नारकीय जीवन के अंधकारमय स्थानों में जाते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥