श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 12

 
श्लोक
युक्तेष्वेवं प्रमत्तस्य कुटुम्बासक्तचेतस: ।
आससाद स वै कालो योऽप्रिय: प्रिययोषिताम् ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
युक्तेषु—उपयोगी कर्मों में; एवम्—इस प्रकार; प्रमत्तस्य—असावधान रहकर; कुटुम्ब—परिवार के प्रति; आसक्त—अनुरक्त; चेतस:—चेतना; आससाद—आ गया; स:—वह; वै—निश्चय ही; काल:—मृत्यु, समय; य:—जो; अप्रिय:—अच्छा न लगने वाला; प्रिय-योषिताम्—जो पुरुष स्त्रियों में अनुरक्त रहते हैं, उनके लिए ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार राजा पुरञ्जन कर्मकाण्ड में तथा अपने परिवार के प्रति अनुरक्त रहकर और दूषित चेतना होने से अन्तत: ऐसे बिन्दु पर पहुँच गया जिसे भौतिक वस्तुओं में बुरी तरह अनुरक्त लोग बिल्कुल नहीं चाहते।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में प्रिययोषिताम् तथा अप्रिय: अत्यन्त सार्थक शब्द हैं। योषित् का अर्थ है “स्त्री” और प्रिय का अर्थ है “प्यारा” या “मनभावन।” मृत्यु उन्हें प्रिय नहीं लगती जो भौतिक सुख के प्रति अधिक अनुरक्त रहते हैं और जिसका अन्त संभोग में होता है। इस प्रसंग में एक अत्यन्त शिक्षाप्रद कहानी है। एक बार एक साधु पुरुष मार्ग पर जा रहा था, तो उसे एक राजकुमार मिला। उसने उसे यह कह कर आशीर्वाद दिया, “राजकुमार! तुम सदा जीते रहो।” फिर उसे एक अन्य साधु पुरुष मिला तो उससे उसने कहा, “चाहो तो जिओ या मरो।” फिर उसे एक ब्रह्मचारी भक्त मिला तो उसे आशीर्वाद दिया, “हे भक्त! तुम तुरन्त मर जाओ।” अन्त में उसे एक शिकारी मिला। उसने कहा, “न तो जिओ, न मरो।” बात ऐसी है कि जो लोग कामी हैं और इन्द्रियतृप्ति में लगे रहते हैं, वे मरना नहीं चाहते। सामान्य रूप से राजकुमार के पास इन्द्रियभोग के लिए पर्याप्त धन होता है, इसीलिए साधु ने कहा कि तुम सदा जीते रहो, क्योंकि जब तक वह जीवित रहेगा सुख भोगेगा और मरने के बाद नरक जाएगा। चूँकि ब्रह्मचारी भक्त तपस्वी जीवन बिता रहा था जिससे कि वह भगवान् के धाम जाए, इसलिए साधु पुरुष ने उसे आशीर्वाद दिया कि वह तुरन्त मर जाए जिससे वृथा श्रम करते रहना न पड़े और वह भगवद्धाम जा सके। साधु पुरुष चाहे मरे या जीवित रहे क्योंकि जीवन के दौरान वह भगवान् की सेवा में लगा है और मृत्यु के बाद भी वह भगवान् की सेवा ही करेगा उसका अत: वर्तमान जीवन तथा अगला जीवन एक सा ही है क्यो्कि वह दोनों प्रकार से भगवान् की सेवा करता है। चूँकि शिकारी पशुओं के वध का जघन्य कार्य करता है और चूँकि मरने पर वह नरक जायेगा, इसीलिए उसे उपदेश दिया गया कि वह चाहे जिये या मरे।
अन्त में राजा पुरञ्जन को बुढ़ापा आ गया। बुढ़ापे में इन्द्रियाँ शिथिल पडऩे लगती हैं और यद्यपि वृद्धपुरुष इद्रियों को भोगना चाहता है, विशेष रूप से विषयसुख, किन्तु ऐसा करने में असमर्थ रहता है, क्योंकि इन्द्रियाँ साथ नहीं दे पातीं। ऐसे कामी पुरुष कभी मरना नहीं चाहते। ऐसे लोग निरन्तर जीवित रहना तथा तथाकथित वैज्ञानिक विधि से अपने जीवन को बढ़ाना चाहते हैं। कुछ मूर्ख रूसी विज्ञानी भी दावा करते हैं कि वैज्ञानिक प्रगति से वे मनुष्य को अमर बनाने जा रहे हैं। ऐसे ही सिरफिरों के नेतृत्व में सभ्यता आगे बढ़ रही है। किन्तु निर्मम मृत्यु इन सबों को समेट लेती है, यद्यपि वे सदा जीवित रहना चाहते हैं। हिरण्यकशिपु में ऐसी ही प्रवृत्ति देखने को मिलती है, किन्तु जब समय आ गया तो भगवान् ने स्वयं क्षण-भर में उसका अन्त कर दिया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥